छिपी हुई कमियां जिन्हें पॉलिसीमेकर्स को ठीक करना होगा: सस्टेनेबल और लचीली भारतीय खेती के लिए एक ब्लूप्रिंट

भारतीय कृषि की यह विस्तृत और साक्ष्य-आधारित रिपोर्ट एक निर्णायक मोड़ को रेखांकित करती है: जहाँ उत्पादन के आंकड़े स्थिर हैं, वहीं पारिस्थितिक और संरचनात्मक आधार दरक रहे हैं। 2025-26 के हालिया आर्थिक सर्वेक्षण और सरकारी रिपोर्टों के आधार पर, यहाँ इन चुनौतियों का एक व्यवस्थित विश्लेषण और उनके समाधान प्रस्तुत हैं।

11 Feb 2026  |  43

भारतीय कृषि की यह विस्तृत और साक्ष्य-आधारित रिपोर्ट एक निर्णायक मोड़ को रेखांकित करती है: जहाँ उत्पादन के आंकड़े स्थिर हैं, वहीं पारिस्थितिक और संरचनात्मक आधार दरक रहे हैं। 2025-26 के हालिया आर्थिक सर्वेक्षण और सरकारी रिपोर्टों के आधार पर, यहाँ इन चुनौतियों का एक व्यवस्थित विश्लेषण और उनके समाधान प्रस्तुत हैं।

1. उर्वरक नीति: उत्पादन की सुरक्षा बनाम मिट्टी का स्वास्थ्य

दशकों से यूरिया पर अत्यधिक सब्सिडी ने भारत के मृदा स्वास्थ्य को "मिट्टी की थकान" (Soil Fatigue) की स्थिति में धकेल दिया है।

वर्तमान संकट: भारत में N:P:K (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम) का आदर्श अनुपात 4:2:1 होना चाहिए, लेकिन 2025 के आंकड़ों के अनुसार यह खतरनाक रूप से 10.9 : 4.1 : 1 हो चुका है। यूरिया की कीमत 2018 से स्थिर (₹242/45kg) रहने के कारण किसान इसका असंतुलित उपयोग कर रहे हैं।

वित्तीय बोझ: वित्त वर्ष 2024-25 में उर्वरक सब्सिडी बढ़कर लगभग ₹1.91 लाख करोड़ हो गई है।

नीतिगत सिफारिश: > यूरिया की कीमतों में मामूली वृद्धि के साथ प्रति एकड़ नकद हस्तांतरण (Direct Cash Transfer) शुरू किया जाए। इससे किसानों की क्रय शक्ति सुरक्षित रहेगी, लेकिन वे सस्ते यूरिया के लालच में मिट्टी को खराब करने के बजाय संतुलित पोषण (NPK + सूक्ष्म पोषक तत्व) चुनेंगे।

2. भूजल: घटता स्तर और गिरती गुणवत्ता

भारत अपनी सिंचाई के लिए 87% भूजल पर निर्भर है, लेकिन अब यह "भविष्य को खाली" करने जैसा है।

खतरनाक रुझान: 2025 के 'डायनामिक ग्राउंड वाटर असेसमेंट' के अनुसार, भारत में लगभग 11% ब्लॉक 'अति-शोषित' (Over-exploited) हैं। विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा में धान की खेती ने एक्विफर्स (Aquifers) को सुखा दिया है।

प्रदूषण: अधिक उर्वरक और बाढ़ सिंचाई (Flood Irrigation) के कारण भूजल में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित सीमा (45 mg/l) से ऊपर चली गई है।

नीतिगत सिफारिश:

भूजल बजटिंग: स्थानीय समुदायों को जल उपयोग के सामूहिक प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

फसल विविधीकरण: कम पानी लेने वाली फसलों जैसे मोटे अनाज (Nutri-cereals), दलहन और तिलहन के लिए सब्सिडी को बिजली सब्सिडी से बदला जाए।

3. किसान उत्पादक संगठन (FPOs): संख्या से प्रदर्शन की ओर

10,000 FPO बनाने का लक्ष्य 2025 में हासिल कर लिया गया है, लेकिन अब ध्यान उनकी गुणवत्ता पर होना चाहिए।

चुनौतियाँ: 40,000 से अधिक सक्रिय FPOs में से अधिकांश अभी भी कार्यशील पूंजी (Working Capital) और पेशेवर प्रबंधन की कमी से जूझ रहे हैं। कई FPO केवल सरकारी अनुदान के लिए बनाए गए हैं, न कि बाजार लिंकेज के लिए।

नीतिगत सिफारिश:

अनुदानों को परिणाम-आधारित (Outcome-based) बनाया जाए। 'राष्ट्रीय FPO इनक्यूबेटर सेल' की स्थापना हो जो इन संगठनों को सीधे बड़े रिटेलर्स और वैश्विक निर्यातकों से जोड़े।

4. डिजिटल कृषि और जलवायु अनुकूलन

डिजिटल इंडिया अब खेतों में 'एग्रीस्टैक' (AgriStack) के माध्यम से प्रवेश कर रहा है।

प्रगति: फरवरी 2026 तक 8.48 करोड़ किसान आईडी तैयार की जा चुकी हैं। 'डिजिटल क्रॉप सर्वे' ने 604 जिलों में सटीक फसल अनुमान लगाने में मदद की है।

नवाचार: 'नमो ड्रोन दीदी' योजना के तहत 15,000 ड्रोन्स के माध्यम से नैनो-उर्वरकों का छिड़काव खेती की लागत कम कर रहा है।

नीतिगत सिफारिश:

मानवीय डिजिटल विस्तार: केवल ऐप्स नहीं, बल्कि 'डिजिटल एजेंट' नियुक्त किए जाएं जो स्थानीय भाषा में डिजिटल डेटा को खेत की क्रियाओं में बदल सकें।

जलवायु-स्मार्ट बंडल: जलवायु-लचीली खेती अपनाने वाले किसानों को विशेष बीमा और ऋण प्रोत्साहन दिया जाए।

5. प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (DDKY)

यूनियन बजट 2025-26 में घोषित यह योजना 100 जिलों में 36 मौजूदा योजनाओं को एक मंच पर लाकर 'कन्वर्टिबल' (परिवर्तनीय) मॉडल पेश करती है। इसका उद्देश्य भंडारण क्षमता को ब्लॉक और पंचायत स्तर तक पहुँचाना है ताकि 20-25% होने वाले फसल-पश्चात नुकसान (Post-harvest losses) को रोका जा सके।

निष्कर्ष: आगे की राह

भारत के पास योजनाओं की कमी नहीं है, बल्कि 'सर्जिकल नीतिगत पुनर्रचना' की आवश्यकता है। अगले 5 वर्षों का केंद्र सब्सिडी को बड़ा बनाने के बजाय उसे 'स्मार्ट' बनाने पर होना चाहिए।

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