हिंद महासागर का नया 'गेम चेंजर': NGT से ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को हरी झंडी, रणनीतिक मोर्चे पर भारत की बड़ी जीत
भारत की समुद्री ताकत और वैश्विक व्यापारिक साख को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का रास्ता साफ हो गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने पर्यावरणीय चिंताओं के बीच इस 90 हजार करोड़ रुपये से अधिक की परियोजना को अपनी मंजूरी दे दी है। यह प्रोजेक्ट न केवल भारत की विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता खत्म करेगा, बल्कि हिंद महासागर में चीन की घेराबंदी को भी मजबूत करेगा।
17 Feb 2026
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नई दिल्ली: भारत की समुद्री ताकत और वैश्विक व्यापारिक साख को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का रास्ता साफ हो गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने पर्यावरणीय चिंताओं के बीच इस 90 हजार करोड़ रुपये से अधिक की परियोजना को अपनी मंजूरी दे दी है। यह प्रोजेक्ट न केवल भारत की विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता खत्म करेगा, बल्कि हिंद महासागर में चीन की घेराबंदी को भी मजबूत करेगा।
विदेशी बंदरगाहों की मनमानी पर लगेगा लगाम
वर्तमान में भारत का 75 प्रतिशत से अधिक ट्रांसशिपमेंट कार्गो कोलंबो (श्रीलंका), सिंगापुर और पोर्ट क्लांग (मलेशिया) जैसे विदेशी बंदरगाहों के जरिए गुजरता है। ग्रेट निकोबार में इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनने के बाद भारत खुद एक ग्लोबल लॉजिस्टिक हब बन जाएगा।
लक्ष्य: 2028 तक परियोजना के पहले चरण को शुरू करना।
लागत: पोर्ट के पहले चरण में करीब 18,000 करोड़ रुपये का निवेश होगा।
रणनीतिक दांव: मलक्का स्ट्रेट पर भारत की 'चौकी'
इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी ताकत इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह पोर्ट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग मलक्का स्ट्रेट से मात्र 40 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित है।
सामरिक महत्व: चीन का अधिकांश ऊर्जा आयात इसी मार्ग से होता है। यहाँ भारत की मौजूदगी सामरिक संतुलन को भारत के पक्ष में झुका देगी।
ड्यूल-यूज एयरपोर्ट: प्रोजेक्ट में एक ऐसा हवाई अड्डा भी शामिल है जिसका उपयोग नागरिक और सैन्य (Civil-Military) दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकेगा।
आर्थिक तर्क: समय और पैसे की बचत
भारत का कंटेनर ट्रैफिक चीन के मुकाबले काफी कम है, जिसका मुख्य कारण कमजोर शिपिंग कनेक्टिविटी रही है।
"गालतिया बे (Galathea Bay) में 20 मीटर से ज्यादा की प्राकृतिक गहराई है। इसका मतलब है कि दुनिया के सबसे बड़े जहाज बिना ज्यादा ड्रेजिंग (खोदाई) के यहाँ लंगर डाल सकेंगे। इससे लॉजिस्टिक लागत में भारी कमी आएगी।"
प्रोजेक्ट की मुख्य विशेषताएं
चुनौतियां और भविष्य
सालों तक पर्यावरणीय अड़चनों में फंसे रहने के बाद, NGT की यह मंजूरी भारत के लिए एक बड़ी राहत है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बंदरगाह भारत को ग्लोबल वैल्यू चेन का एक अनिवार्य हिस्सा बना देगा। अब चुनौती समय पर निष्पादन (Execution) की है, ताकि 2028 तक भारत का अपना 'सिंगापुर' बंगाल की खाड़ी में तैयार हो सके।