चुनावी दहलीज पर कांग्रेस: 2026 की अग्निपरीक्षा और अंतर्कलह की चुनौती

साल 2025 में दिल्ली और बिहार के चुनावों में मिली निराशा के बाद, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए 2026 का आगाज़ 'करो या मरो' की स्थिति जैसा है। अप्रैल और मई में होने वाले चार राज्यों—केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम—के विधानसभा चुनाव न केवल कांग्रेस का भविष्य तय करेंगे, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए उसकी राष्ट्रीय प्रासंगिकता को भी पुनर्स्थापित करेंगे।

18 Feb 2026  |  36

नई दिल्ली: साल 2025 में दिल्ली और बिहार के चुनावों में मिली निराशा के बाद, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए 2026 का आगाज़ 'करो या मरो' की स्थिति जैसा है। अप्रैल और मई में होने वाले चार राज्यों—केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम—के विधानसभा चुनाव न केवल कांग्रेस का भविष्य तय करेंगे, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए उसकी राष्ट्रीय प्रासंगिकता को भी पुनर्स्थापित करेंगे।

केरल और तमिलनाडु: उम्मीद की किरण

दक्षिण भारत के ये दो राज्य कांग्रेस के लिए सबसे सुरक्षित और मजबूत गढ़ माने जा रहे हैं।

केरल: दिसंबर 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में 38% वोट शेयर हासिल करने के बाद कांग्रेस उत्साह में है। पार्टी ने 'सामूहिक नेतृत्व' का दांव चलते हुए रमेश चेन्निथला को अभियान का प्रमुख और शशि थरूर को उप-प्रमुख बनाया है। थरूर और पार्टी के बीच जमी बर्फ पिघलती दिख रही है, जिससे मुख्यमंत्री पद की खींचतान फिलहाल शांत है।

तमिलनाडु: यहाँ DMK के साथ गठबंधन मजबूती से खड़ा है। हालांकि, सीट-बंटवारे और सरकार में भागीदारी की मांगों को लेकर थोड़ी तल्खी जरूर है, लेकिन अभिनेता विजय की नई पार्टी (TVK) के उदय के बीच कांग्रेस अपनी जमीन बचाने के लिए DMK के साथ ही रहने की इच्छुक है।

बंगाल और असम: कांटों भरी राह

उत्तर और पूर्वी भारत में कांग्रेस की राह काफी कठिन नजर आ रही है।

पश्चिम बंगाल: यहाँ कांग्रेस ने एक बार फिर 'एकला चलो रे' की नीति अपनाई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भाजपा जैसे दिग्गजों के बीच शून्य से शुरुआत करना एक बड़ा जोखिम है। 2021 में एक भी सीट न जीत पाने वाली कांग्रेस के पास यहाँ खोने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन पाने के लिए संघर्ष बहुत बड़ा है।

असम: यहाँ असली संकट अंतर्कलह है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा की नाराजगी और उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलों ने पार्टी की तैयारियों पर पानी फेर दिया है। गौरव गोगोई के सामने चुनौती न केवल भाजपा से लड़ने की है, बल्कि अपने पुराने नेताओं को पाले में बनाए रखने की भी है।

बीते कल से सबक: हार का 'पैटर्न'

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा दुश्मन कोई बाहरी पार्टी नहीं, बल्कि उसकी अपनी आंतरिक गुटबाजी रही है। पिछले कुछ वर्षों के परिणाम इसकी गवाही देते हैं:

राज्य (चुनाव वर्ष)आंतरिक प्रतिद्वंद्वितापरिणाम
हरियाणा (2024)कुमारी शैलजा बनाम भूपेंद्र सिंह हुड्डानिश्चित जीत हार में बदली
छत्तीसगढ़ (2023)भूपेश बघेल बनाम टी.एस. सिंह देवसत्ता हाथ से गई
राजस्थान (2023)अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलटभाजपा की वापसी

"2026 में जीत का स्वाद चखने के लिए कांग्रेस को न केवल सहयोगियों के साथ तालमेल बिठाना होगा, बल्कि अपने घर के भीतर लगी 'महत्वाकांक्षा की आग' को भी बुझाना होगा।"

निष्कर्ष: 2029 का रोडमैप

कांग्रेस जानती है कि केरल और तमिलनाडु में जीत उसे राष्ट्रीय राजनीति में संजीवनी देगी, लेकिन असम और बंगाल में प्रदर्शन उसकी सांगठनिक क्षमता का लिटमस टेस्ट होगा। प्रियंका गांधी वाड्रा का आगामी असम दौरा और राहुल गांधी की सक्रियता क्या इन दरारों को भर पाएगी? यह देखना दिलचस्प होगा।

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