कचरे से 'सफेद सोना' निकाल रहा भारत: ई-वेस्ट बना अर्थव्यवस्था की नई 'सोने की खान', 6 अरब डॉलर के अवसर
भारत की बढ़ती डिजिटल जरूरतों और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की लहर ने देश को एक नए संकट और अवसर के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। जहाँ एक ओर इलेक्ट्रॉनिक कचरे (E-waste) का पहाड़ खड़ा हो रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय कंपनियां इसी कचरे से 'क्रिटिकल मिनरल्स' निकालकर देश को आत्मनिर्भर बनाने में जुट गई हैं। स्मार्टफ़ोन से लेकर फाइटर जेट तक में इस्तेमाल होने वाले लिथियम और कोबाल्ट की रिकवरी अब भारत के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो रही है।
18 Feb 2026
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नई दिल्ली/हरियाणा: भारत की बढ़ती डिजिटल जरूरतों और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की लहर ने देश को एक नए संकट और अवसर के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। जहाँ एक ओर इलेक्ट्रॉनिक कचरे (E-waste) का पहाड़ खड़ा हो रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय कंपनियां इसी कचरे से 'क्रिटिकल मिनरल्स' निकालकर देश को आत्मनिर्भर बनाने में जुट गई हैं। स्मार्टफ़ोन से लेकर फाइटर जेट तक में इस्तेमाल होने वाले लिथियम और कोबाल्ट की रिकवरी अब भारत के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो रही है।
ई-वेस्ट: 'अर्बन माइनिंग' का नया युग
माइनिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत में घरेलू खनन से उत्पादन शुरू होने में अभी कम से कम एक दशक का समय लग सकता है। ऐसे में 'अर्बन माइनिंग' यानी ई-वेस्ट से खनिजों की रिकवरी सबसे तेज विकल्प बनकर उभरी है।
बड़ा बाजार: इंडस्ट्री अनुमानों के अनुसार, ई-वेस्ट से मिनरल्स निकालने के इस कारोबार की कीमत सालाना 6 बिलियन डॉलर (लगभग 50,000 करोड़ रुपये) तक हो सकती है।
व्हाइट गोल्ड: हरियाणा स्थित एक्सिगो (Exigo) रीसाइक्लिंग जैसे प्लांट्स में ई-स्कूटर की पुरानी बैटरियों को प्रोसेस कर लिथियम निकाला जा रहा है, जिसे वैज्ञानिक 'सफेद सोना' कह रहे हैं।
कचरे का पहाड़: पिछले साल भारत में लगभग 1.5 मिलियन टन ई-वेस्ट पैदा हुआ, जो 2 लाख कचरा ट्रकों को भरने के लिए काफी है।
सरकारी प्रोत्साहन और EPR के नियम
लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे जरूरी खनिजों के लिए भारत वर्तमान में 100% आयात पर निर्भर है। इस निर्भरता को कम करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 170 मिलियन डॉलर के विशेष प्रोत्साहन प्रोग्राम को मंजूरी दी है।
एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR): इस नियम के तहत इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली कंपनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे पुराने ई-वेस्ट को इकट्ठा करें और उसे रजिस्टर्ड रीसाइकिलर्स तक पहुँचाएं। एटेरो (Attero) रीसाइक्लिंग जैसे संस्थानों का दावा है कि वे अब कचरे से 22 जरूरी मिनरल्स को रिकवर करने में सक्षम हैं।
चुनौतियां: इनफॉर्मल सेक्टर और पर्यावरणीय खतरे
सफलता की इन कहानियों के बीच एक बड़ी चुनौती 'इनफॉर्मल सेक्टर' की है। दिल्ली के सीलमपुरी जैसे इलाकों में आज भी बड़ी मात्रा में ई-वेस्ट असुरक्षित तरीके से प्रोसेस किया जाता है।
| औपचारिक (Formal) रीसाइक्लिंग | अनौपचारिक (Informal) रीसाइक्लिंग |
|---|---|
| आधुनिक तकनीक और सुरक्षा उपकरणों का उपयोग। | खुले में जलाना और एसिड बाथ, जो स्वास्थ्य के लिए घातक है। |
| लिथियम और कोबाल्ट जैसे सूक्ष्म मिनरल्स की रिकवरी। | केवल कॉपर और एल्युमीनियम जैसे आसान मेटल्स पर ध्यान। |
| सरकारी डेटा और ट्रेसेबिलिटी सिस्टम से लैस। | मिट्टी और पानी को जहरीला बनाने का खतरा। |
आगे की राह: सप्लाई चेन की मजबूती
नीति आयोग ने चेतावनी दी है कि कचरे की बढ़ती मात्रा के मुकाबले संगठित रीसाइक्लिंग की रफ्तार अभी धीमी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इनफॉर्मल सेक्टर (कबाड़ डीलरों) को फॉर्मल सप्लाई चेन से जोड़ दिया जाए, तो कीमती मिनरल्स के नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। यह न केवल पर्यावरण बचाएगा, बल्कि भविष्य की सप्लाई चेन के झटकों को सहने के लिए भारत को एक 'रक्षा कवच' भी प्रदान करेगा।