वक्फ बोर्ड विवाद: मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, सुचारू रहेगा कामकाज
तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के गठन को लेकर चल रही कानूनी खींचतान में आज सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसने बोर्ड को पूरी तरह 'निष्क्रिय' घोषित करते हुए उसकी शक्तियों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब तमिलनाडु वक्फ बोर्ड पुन: अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकेगा।
19 Feb 2026
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नई दिल्ली: तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के गठन को लेकर चल रही कानूनी खींचतान में आज सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसने बोर्ड को पूरी तरह 'निष्क्रिय' घोषित करते हुए उसकी शक्तियों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी।
सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद अब तमिलनाडु वक्फ बोर्ड पुन: अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: "हाई कोर्ट का फैसला गलत"
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए कहा कि केवल कुछ सदस्यों की नियुक्ति न होने के आधार पर पूरे बोर्ड का कामकाज रोकना उचित नहीं है।
अनिवार्यता का सिद्धांत: बेंच ने स्पष्ट किया कि कामकाज को सुचारू रखने के लिए 'अनिवार्यता का सिद्धांत' लागू होना चाहिए।
अदालत का आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को स्थगित करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह बोर्ड के पूर्ण गठन का प्रस्ताव पेश करे।
क्या था विवाद का मुख्य कारण?
मद्रास हाई कोर्ट ने वक्फ एक्ट, 1995 की धारा 14 के उल्लंघन के आधार पर बोर्ड को काम करने से रोक दिया था। याचिकाकर्ता ने निम्नलिखित तर्क दिए थे:
गैर-मुस्लिम सदस्यों की कमी: नियम के अनुसार, पदेन सदस्यों को छोड़कर बोर्ड में कम से कम दो गैर-मुस्लिम सदस्य होने अनिवार्य हैं, जिनका पालन नहीं किया गया था।
पेशेवर अनुभव का अभाव: एक्ट के मुताबिक विभिन्न क्षेत्रों (जैसे फाइनेंस, सोशल वर्क आदि) के दो विशेषज्ञों की जरूरत थी, जबकि केवल एक ही नियुक्त था।
बार काउंसिल का प्रतिनिधित्व: राज्य बार काउंसिल के किसी सदस्य को नॉमिनेट नहीं किया गया था।
बोर्ड की दलील: "प्रक्रिया जारी है"
बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने अदालत को बताया कि 11 में से 8 सदस्यों की नियुक्ति पहले ही हो चुकी है और केवल 3 पद शेष हैं। उन्होंने दलील दी कि:
बार काउंसिल में चुनाव चलने के कारण वहां से नॉमिनी नियुक्त करने में देरी हुई।
केवल 3 सदस्यों की अनुपस्थिति बोर्ड के वैधानिक कार्यों को रोकने का आधार नहीं हो सकती।
कोर्ट रूम का घटनाक्रम एक नज़र में
| पक्ष | मुख्य तर्क |
|---|---|
| मद्रास हाई कोर्ट | बोर्ड का गठन कानून सम्मत नहीं था, इसलिए इसकी शक्तियां शून्य हैं। |
| सुप्रीम कोर्ट | बोर्ड को निष्क्रिय करना गलत; अधूरे गठन के बावजूद कामकाज जारी रहना चाहिए। |
| तमिलनाडु सरकार | बाकी बचे तीन पदों को भरने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। |
अगली कार्यवाही: मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को होगी, जिसमें सरकार को शेष तीन सदस्यों की संभावित नियुक्ति और बोर्ड के पूर्ण ढांचे की जानकारी देनी होगी।