डॉलर के सामने पस्त हुआ रुपया: पहली बार ₹91 के पार; 2025 में एशिया की सबसे कमजोर करेंसी बनी भारतीय मुद्रा

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। वर्ष 2025 भारतीय रुपये के लिए अब तक का सबसे कठिन साल साबित हुआ है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 91 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है। आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी से 15 दिसंबर 2025 के बीच रुपये में 6% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है, जो इसे इस वर्ष एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बनाता है।

19 Feb 2026  |  29

मुंबई/नई दिल्ली:भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। वर्ष 2025 भारतीय रुपये के लिए अब तक का सबसे कठिन साल साबित हुआ है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 91 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है। आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी से 15 दिसंबर 2025 के बीच रुपये में 6% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है, जो इसे इस वर्ष एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बनाता है।

एशियाई बाजार में रुपये की स्थिति: एक तुलना

जहाँ एक ओर भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर है, वहीं भारत के प्रतिस्पर्धी एशियाई देशों की मुद्राओं का रुख मिला-जुला रहा है। निर्यात के मोर्चे पर भारत को टक्कर देने वाले देशों की स्थिति इस प्रकार है:

मुद्रा की स्थितिदेश
गिरावट दर्ज की गईभारत (रुपया), वियतनाम (डोंग), इंडोनेशिया (रुपिया)
स्थिरतादक्षिण कोरिया (वॉन)
मजबूती (Appreciation)चीन (युआन), सिंगापुर (डॉलर), थाईलैंड (बहत), मलेशिया (रिंगिट)

कमजोर रुपये से निर्यात को 'फायदा' या 'नुकसान'?

आमतौर पर यह माना जाता है कि मुद्रा के कमजोर होने से निर्यात सस्ता होता है और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। लेकिन वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में यह धारणा टूटती नजर आ रही है:

कच्चे माल की लागत: भारत के कई प्रमुख निर्यात (जैसे रत्न-आभूषण और इलेक्ट्रॉनिक्स) आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं। रुपये के कमजोर होने से इन कच्चे माल का आयात महंगा हो गया है, जिससे अंतिम उत्पाद की लागत बढ़ गई है।

प्रतिस्पर्धा का अभाव: चीन और मलेशिया जैसे देशों की करेंसी मजबूत होने के बावजूद, उनकी बेहतर लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन के कारण वे भारत से अधिक प्रतिस्पर्धी बने हुए हैं।

महंगाई का बोझ: रुपया गिरने से कच्चे तेल का आयात महंगा हो गया है, जिससे घरेलू बाजार में माल ढुलाई और उत्पादन की लागत बढ़ गई है।

गिरावट के प्रमुख कारण

विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की इस दुर्गति के पीछे केवल घरेलू नहीं, बल्कि वैश्विक कारण भी जिम्मेदार हैं:

यूएस टैरिफ का असर: अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए 50% तक के दंडात्मक टैरिफ ने निर्यात संभावनाओं को चोट पहुँचाई है।

कैपिटल आउटफ्लो: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार से बड़े पैमाने पर पैसा निकालकर डॉलर में निवेश किया है।

ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा): अक्टूबर 2025 में भारत का व्यापार घाटा रिकॉर्ड $41.7 बिलियन तक पहुँच गया, जिसने रुपये पर भारी दबाव बनाया।

विशेषज्ञ की राय: "रुपये का गिरना अब केवल निर्यात बढ़ाने का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह आयातित महंगाई (Imported Inflation) का खतरा बढ़ा रहा है। यदि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता जल्द नहीं होता, तो रुपया ₹92-93 के स्तर तक भी जा सकता है।"

ट्रेंडिंग