सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 'बाबर' के नाम पर मस्जिद निर्माण रोकने से इनकार, याचिका खारिज

उच्चतम न्यायालय ने मुगल शासक बाबर या 'बाबरी मस्जिद' के नाम पर किसी भी नई धार्मिक संरचना के निर्माण या नामकरण पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को शुक्रवार को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी वापस ले ली।

20 Feb 2026  |  19

नई दिल्ली | उच्चतम न्यायालय ने मुगल शासक बाबर या 'बाबरी मस्जिद' के नाम पर किसी भी नई धार्मिक संरचना के निर्माण या नामकरण पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को शुक्रवार को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी वापस ले ली।

याचिका का आधार: "आक्रमणकारी के नाम पर न हो निर्माण"

सुप्रीम कोर्ट में दायर इस जनहित याचिका में तर्क दिया गया था कि मुगल शासक बाबर एक 'हिंदू विरोधी आक्रमणकारी' था, इसलिए भारत में किसी भी स्थान पर उसके नाम पर मस्जिद या धार्मिक ढांचा नहीं बनाया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता के वकील ने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद का जिक्र किया, जहाँ बाबरी मस्जिद की एक प्रतिकृति (Replica) तैयार की जा रही है।

संविधान और व्यक्तिगत अधिकार का हवाला

सुनवाई के दौरान पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था के अनुसार धार्मिक स्थल बनाने की स्वतंत्रता देता है।

न्यायालय की टिप्पणी: पीठ ने याचिका पर विचार करने में कोई रुचि नहीं दिखाई और संकेत दिया कि कानूनन किसी को मस्जिद बनाने से सिर्फ इसलिए नहीं रोका जा सकता क्योंकि उसका नामकरण किसी विशिष्ट ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर है।

मुर्शिदाबाद विवाद: हुमायूं कबीर का कड़ा रुख

यह कानूनी विवाद तब और गरमा गया जब पश्चिम बंगाल के पूर्व तृणमूल विधायक और जन उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर ने 6 दिसंबर, 2025 को मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखी।

हुमायूं कबीर के मुख्य तर्क:

संवैधानिक अधिकार: "जिस तरह देश में मंदिर या चर्च बनाने का अधिकार है, उसी तरह मस्जिद बनाना भी मेरा संवैधानिक अधिकार है। मैं कुछ भी गैर-संवैधानिक नहीं कर रहा हूँ।"

जनसंख्या का समर्थन: कबीर ने दावा किया कि बंगाल की 37 प्रतिशत मुस्लिम आबादी इस निर्माण के साथ खड़ी है और कोई इसकी "एक ईंट भी नहीं हिला सकता।"

कानूनी चुनौतियां: उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ पांच मामले दर्ज किए गए हैं, लेकिन वे निर्माण कार्य नहीं रोकेंगे।

प्रमुख बिंदु: एक नजर में

विषयविवरण
सुप्रीम कोर्ट की बेंचन्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता
मुख्य मांगबाबर/बाबरी के नाम पर धार्मिक स्थलों पर राष्ट्रव्यापी रोक।
कोर्ट का रुखयाचिका खारिज; संवैधानिक अधिकारों का संरक्षण।
विवाद का केंद्रमुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल) में निर्माणाधीन मस्जिद।

निष्कर्ष: कूटनीतिक और कानूनी प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को पुनः पुष्ट करता है। जहाँ एक ओर याचिकाकर्ता इसे ऐतिहासिक घावों से जोड़कर देख रहे थे, वहीं न्यायालय ने इसे व्यक्तिगत और संवैधानिक अधिकारों के चश्मे से देखा है। मुर्शिदाबाद में चल रहा यह निर्माण आने वाले समय में राजनीतिक गलियारों में और भी चर्चा का विषय बन सकता है।

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