मिडिल ईस्ट का चक्रव्यूह: समझौते से ज्यादा 'जंग' में क्यों दिलचस्पी दिखा रहा है ईरान?

परमाणु समझौते (Nuclear Deal) के नाम पर अमेरिका और ईरान के बीच शह-मात का खेल अब एक खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया है। जहाँ वाशिंगटन तेहरान पर कड़ी शर्तें थोपकर उसे आर्थिक और सैन्य रूप से पस्त करना चाहता है, वहीं ईरान परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता के अलावा किसी भी अन्य शर्त को मानने को तैयार नहीं है। भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अब समझौते से ज्यादा एक 'सीमित जंग' की रणनीति पर काम कर रहा है।

20 Feb 2026  |  21

तेहरान/वाशिंगटन | परमाणु समझौते (Nuclear Deal) के नाम पर अमेरिका और ईरान के बीच शह-मात का खेल अब एक खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया है। जहाँ वाशिंगटन तेहरान पर कड़ी शर्तें थोपकर उसे आर्थिक और सैन्य रूप से पस्त करना चाहता है, वहीं ईरान परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता के अलावा किसी भी अन्य शर्त को मानने को तैयार नहीं है। भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान अब समझौते से ज्यादा एक 'सीमित जंग' की रणनीति पर काम कर रहा है।

ईरान की रणनीति: जंग के जरिए वर्चस्व की तलाश

ईरान का मानना है कि अमेरिका के साथ लंबी खिंचने वाली जंग उसे मिडिल ईस्ट का निर्विवाद नेता बना सकती है। इसके पीछे कई रणनीतिक कारण हैं:

1. अमेरिका का कूटनीतिक अलगाव

वर्तमान में इस मुद्दे पर अमेरिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकेला पड़ता दिख रहा है। इजराइल को छोड़कर, तुर्की और सऊदी अरब जैसे क्षेत्रीय दिग्गजों ने युद्ध का विरोध किया है। इन देशों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे ईरान के खिलाफ हमले के लिए अमेरिका को अपने सैन्य बेस (Bases) का इस्तेमाल नहीं करने देंगे। ईरान की इस धमकी ने कि 'बेस देने वाले देशों पर भी हमला होगा', पड़ोसी देशों को सतर्क कर दिया है।

2. यूरोपीय सहयोगियों की बेरुखी

अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी भी इस बार पीछे हटते दिख रहे हैं:

ब्रिटेन: उसने अपने हवाई अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया है।

जर्मनी: उसने इराक से अपने सैनिकों को वापस बुलाने की घोषणा कर दी है।

पश्चिमी देशों की यह अनिच्छा ईरान के हौसलों को बढ़ा रही है।

ईरान समझौते से क्यों बच रहा है?

ईरान के लिए 'बैड डील' (खराब समझौता) युद्ध से ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकती है:

आंतरिक अस्थिरता का डर: ईरान के भीतर इस्लामिक शासन के खिलाफ विरोध की लहर तेज है। हाल ही में हुए प्रदर्शनों में करीब 3,000 लोग मारे गए थे। ऐसे में अमेरिकी शर्तों के सामने झुकना सरकार के लिए 'कमजोरी' का संकेत माना जाएगा, जो सत्ता के लिए घातक हो सकता है।

भरोसे की कमी (2015 का अनुभव): 2015 में हुए परमाणु समझौते को डोनाल्ड ट्रंप ने महज दो साल बाद ही तोड़ दिया था। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई इस धोखे को भूले नहीं हैं और वे किसी भी नए वादे पर यकीन करने को तैयार नहीं हैं।

जंग का गणित: ईरान बनाम अमेरिका

कारकईरान की स्थितिअमेरिका की स्थिति
लक्ष्यमिडिल ईस्ट में अमेरिकी प्रभाव को खत्म करना।शासन परिवर्तन या परमाणु कार्यक्रम पर पूर्ण रोक।
ताकतक्षेत्रीय प्रोक्सी नेटवर्क और लंबी दूरी की मिसाइलें।अत्याधुनिक तकनीक और वैश्विक आर्थिक प्रतिबंध।
कमजोरीजर्जर अर्थव्यवस्था और आंतरिक विद्रोह।घरेलू राजनीति और लंबे युद्ध का भारी खर्च।

निष्कर्ष: क्या युद्ध अपरिहार्य है?

ईरान को पता है कि अमेरिका लंबी और खर्चीली जंग लड़ने की स्थिति में नहीं है। तेहरान की कोशिश युद्ध को इतना खींचने की है कि अमेरिका थककर पीछे हट जाए और ईरान अपनी शर्तों पर नया वैश्विक ऑर्डर (Order) तय करे। अगर वार्ता विफल रहती है, तो आने वाले दिन पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था और शांति के लिए भारी पड़ सकते हैं।

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