कश्मीर के 'धान-गेहूं चक्र' को बचाने के लिए SKUAST-K की बड़ी सफलता; गेहूं की दो नई किस्में विकसित
कश्मीर घाटी में वर्षों से चली आ रही 'चावल-गेहूं रोटेशन' की समस्या को सुलझाने के लिए SKUAST-K के वैज्ञानिकों ने एक निर्णायक समाधान खोज निकाला है। विश्वविद्यालय ने गेहूं की ऐसी दो नई किस्में तैयार की हैं जो समय से पहले पककर तैयार हो जाएंगी, जिससे किसान समय पर धान की रोपाई कर सकेंगे।
20 Feb 2026
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श्रीनगर | कश्मीर घाटी में वर्षों से चली आ रही 'चावल-गेहूं रोटेशन' की समस्या को सुलझाने के लिए SKUAST-K के वैज्ञानिकों ने एक निर्णायक समाधान खोज निकाला है। विश्वविद्यालय ने गेहूं की ऐसी दो नई किस्में तैयार की हैं जो समय से पहले पककर तैयार हो जाएंगी, जिससे किसान समय पर धान की रोपाई कर सकेंगे।
समय का संकट: क्यों जरूरी था यह नवाचार?
कश्मीर की कृषि अर्थव्यवस्था में समय का प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती है। घाटी का फसल चक्र कुछ इस प्रकार है:
अक्टूबर: गेहूं की बुवाई का समय।
मई-जून: धान (प्रमुख खरीफ फसल) की रोपाई का समय।
समस्या: पारंपरिक गेहूं की फसल को पकने में जून तक का समय लग जाता है। यदि गेहूं जून के अंत तक खेतों में रहता है, तो धान की रोपाई में देरी हो जाती है, जिससे पूरा फसल चक्र (Rice-Wheat Rotation) बिगड़ जाता है। इसी कारण कई किसान गेहूं की बुवाई से कतराते थे।
नई किस्मों की विशेषताएं और लाभ
SKUAST-K द्वारा विकसित ये दो नई किस्में न केवल कम समय में तैयार होती हैं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की खाद्य सुरक्षा में भी बड़ा योगदान देंगी:
समय पूर्व कटाई: ये किस्में मई के अंत या जून की शुरुआत तक कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं, जिससे किसानों को धान की रोपाई के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है।
उत्पादन में वृद्धि: इन किस्मों के आने से अब वे किसान भी गेहूं लगा सकेंगे जो पहले समय की कमी के कारण खेत खाली छोड़ देते थे। इससे केंद्र शासित प्रदेश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
जलवायु अनुकूल: इन बीजों को कश्मीर की विशिष्ट जलवायु और मिट्टी की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
कृषि विशेषज्ञों का मत
वैज्ञानिकों का मानना है कि इन नई किस्मों के प्रसार से कश्मीर के किसान अब साल में दो फसलें लेने में सक्षम होंगे। इससे न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि कश्मीर की अन्य राज्यों पर खाद्यान्न निर्भरता भी कम होगी।
"यह खोज केवल बीज विकसित करना नहीं है, बल्कि कश्मीर के पारंपरिक कृषि ढांचे को आधुनिक और अधिक उत्पादक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।" — SKUAST-K शोध दल