कारगिल जैसी 'नापाक' दोहराव: अपने ही सैनिकों को पहचानने से पाक सेना का इनकार, BLA ने जारी किए पहचान पत्र

: पाकिस्तान की सेना एक बार फिर अपने ही जवानों को लावारिस छोड़ने के पुराने ढर्रे पर चलती नजर आ रही है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा बंधक बनाए गए 7 पाकिस्तानी सैनिकों के मामले ने 1999 के कारगिल युद्ध की उन कड़वी यादों को ताजा कर दिया है, जब पाकिस्तान ने अपने शहीद सैनिकों के शव लेने तक से इनकार कर दिया था। आज स्थिति यह है कि वर्दी में खड़ा जवान खुद वीडियो पर अपना सर्विस कार्ड दिखाकर अपनी पहचान साबित करने की गुहार लगा रहा है।

21 Feb 2026  |  20

क्वेटा/इस्लामाबाद: पाकिस्तान की सेना एक बार फिर अपने ही जवानों को लावारिस छोड़ने के पुराने ढर्रे पर चलती नजर आ रही है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा बंधक बनाए गए 7 पाकिस्तानी सैनिकों के मामले ने 1999 के कारगिल युद्ध की उन कड़वी यादों को ताजा कर दिया है, जब पाकिस्तान ने अपने शहीद सैनिकों के शव लेने तक से इनकार कर दिया था। आज स्थिति यह है कि वर्दी में खड़ा जवान खुद वीडियो पर अपना सर्विस कार्ड दिखाकर अपनी पहचान साबित करने की गुहार लगा रहा है।

घटनाक्रम: दावों और इनकार की जंग

14 फरवरी को BLA ने दावा किया कि उसने पाकिस्तानी सेना के 7 जवानों को हिरासत में लिया है। संगठन ने एक अल्टीमेटम जारी करते हुए कहा कि यदि 21 फरवरी तक उनके गिरफ्तार लड़ाकों को रिहा नहीं किया गया, तो इन जवानों को मार दिया जाएगा।

सेना का रुख: जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व वाली पाक सेना के मीडिया विंग (ISPR) ने इसे 'फेक न्यूज़' और 'छेड़छाड़ किया गया वीडियो' बताकर पल्ला झाड़ लिया।

BLA का पलटवार: जवाब में BLA ने एक नया वीडियो जारी किया, जिसमें सिपाही मोहम्मद शहराम समेत अन्य सैनिक अपना सैन्य पहचान पत्र और NADRA कार्ड दिखाते नजर आ रहे हैं। शहराम का सवाल सीधा है— "अगर हम सेना के नहीं हैं, तो ये कार्ड किसने जारी किए?"

क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है? (कारगिल कनेक्शन)

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने अपने सैनिकों को पहचानने से इनकार किया है। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ ने इसे 'मुजाहिदीन' की जंग बताया था।

इतिहास के पन्नों से समानताएं:

पहचान से इनकार: कारगिल में नियमित सैनिकों को घुसपैठिया बताया गया, यहाँ बंधक सैनिकों को फर्जी कहा जा रहा है।

शवों का अपमान: कारगिल में भारत ने पाकिस्तानी सैनिकों के शव ससम्मान दफनाए थे क्योंकि पाकिस्तान ने उन्हें लेने से मना कर दिया था।

रणनीतिक बुजदिली: अंतरराष्ट्रीय दबाव और अपनी विफलता को छिपाने के लिए 'स्ट्रेटेजिक डिनायल' (रणनीतिक इनकार) का सहारा लेना पाकिस्तान की पुरानी फितरत रही है।

इन्फॉर्मेशन वॉर या नैतिक पतन?

पाकिस्तानी सेना इसे 'डिजिटल मीडिया के जरिए दबाव बनाने की रणनीति' करार दे रही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी देश को अपनी रणनीति के लिए अपने ही सैनिकों की बलि देनी चाहिए?

पाकिस्तान की रणनीति के तीन संभावित पहलू:

रणनीतिक इनकार: ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह न दिखे कि सेना विद्रोही समूहों के सामने कमजोर पड़ रही है।

भ्रम फैलाना: अपने ही कैडरों के बीच यह संदेश देना कि वीडियो में दिख रहे लोग दुश्मन के एजेंट हैं।

जिम्मेदारी से बचना: सैनिकों के परिवार और समाज के प्रति जवाबदेही से बचने का सबसे आसान तरीका 'इनकार' ही है।

21 फरवरी की समय-सीमा और मानवीय संकट

एक सैनिक, जो अपने परिवार का एकमात्र सहारा है और जिसके पिता दिव्यांग हैं, आज अपनी ही सरकार से अपनी पहचान की भीख मांग रहा है। यह मामला अब केवल सैन्य रणनीति का नहीं, बल्कि पाकिस्तान की संस्थागत विश्वसनीयता का है।

"जब वर्दी में खड़ा जवान खुद अपनी पहचान साबित करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि उस देश की सैन्य नैतिकता का पतन हो चुका है।"

अब पूरी दुनिया की नजरें 21 फरवरी पर टिकी हैं। क्या पाकिस्तान की सेना अपनी चुप्पी तोड़ेगी या एक बार फिर अपने जवानों को इतिहास के काले पन्नों में गुम होने के लिए छोड़ देगी?

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