विशेष संपादकीय | सृष्टि के आरंभ से ही भारतीय संस्कृति में नारी को केवल एक इकाई नहीं, बल्कि आदि-शक्ति का साक्षात स्वरूप माना गया है। आधुनिक युग में जहाँ हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, वहीं हमारे प्राचीन ग्रंथ हजारों वर्षों से यह उद्घोष करते आ रहे हैं कि स्त्री और पुरुष एक ही सत्ता के दो अभिन्न अंग हैं।
श्रीमद्भागवत से लेकर ऋग्वेद तक, हमारे शास्त्रों में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि नारी के बिना ईश्वर की लीला और राष्ट्र का अस्तित्व, दोनों ही अधूरे हैं। 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस' के पावन अवसर पर आइए दृष्टि डालते हैं उन 8 स्वर्णिम प्रमाणों पर, जो नारी की गरिमा को नई ऊंचाई प्रदान करते हैं:
1. सृष्टि की आदि-इकाई: मनु और शतरूपा
श्रीमद्भागवतम् (3.12.52) के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि का विस्तार किया, तो उनके शरीर से एक युगल प्रकट हुआ। इसमें पुरुष 'स्वायम्भुव मनु' कहलाए और स्त्री 'शतरूपा'। यह इस बात का प्रमाण है कि मानवता की उत्पत्ति में स्त्री और पुरुष का स्थान समान और समानांतर है।
2. शक्ति और शक्तिमान का अद्वैत संबंध
चैतन्य चरितामृत (आदि 4.96) में स्पष्ट कहा गया है कि श्री राधा 'पूर्ण शक्ति' हैं और श्री कृष्ण 'पूर्ण शक्तिमान'। शास्त्रों के अनुसार, इन दोनों में कोई भेद नहीं है; जैसे पुष्प से उसकी सुगंध को अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही शक्तिमान से उसकी शक्ति (नारी) को पृथक नहीं किया जा सकता।
3. राष्ट्र की प्रथम मार्गदर्शक
ऋग्वेद का देवी सूक्त (10.125.3) नारी को राष्ट्र के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करता है। इसमें देवी स्वयं कहती हैं, "मैं ही पूरे राष्ट्र की शासिका हूँ, जो प्रजा को सुख-संपत्ति प्रदान करती है।" यह प्रमाणित करता है कि शासन और ज्ञान में नारी सदैव अग्रणी रही है।
4. समस्त विद्याओं का आधार
मार्कण्डेय पुराण (11.6) के अनुसार, संसार की समस्त विद्याएँ और जगत की समस्त स्त्रियाँ साक्षात् देवी का ही स्वरूप हैं। स्त्री का सम्मान करना साक्षात् ज्ञान और पराशक्ति का सम्मान करने के तुल्य है।
5. जगत की प्राण-चेतना
देवी भागवत पुराण (9.1.96) नारी को 'सर्वधारिणी' कहता है। वह 'स्वाहा' और 'स्वधा' के रूप में यज्ञों का आधार है और 'दक्षिणा' के रूप में कर्मों को पूर्णता प्रदान करने वाली ऊर्जा है।
6. जहाँ नारी, वहीं ईश्वर का वास
मनुस्मृति (3.56) का प्रसिद्ध श्लोक आज भी प्रासंगिक है: "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।" अर्थात जिस कुल या राष्ट्र में नारी का सम्मान होता है, वहीं दिव्यता और खुशहाली का निवास होता है।
7. संकट की अटूट सारथी
वाल्मीकि रामायण में उल्लेख है कि कठिन से कठिन समय में, जब सभी मार्ग अवरुद्ध प्रतीत होते हैं, तब नारी ही अपने परिवार के लिए सबसे बड़ा संबल और सुरक्षा कवच बनकर उभरती है।
8. संस्कारों की शाश्वत जननी
स्कंद पुराण के अनुसार, जीवन की हर अवस्था में—चाहे वह पुत्री हो, पत्नी हो या माता—नारी सदैव पूजनीय है। वह केवल संस्कारों की जननी ही नहीं, बल्कि समाज की नैतिकता की रक्षक भी है।
निष्कर्ष: ये आठ प्रमाण इस बात के साक्षी हैं कि भारतीय मनीषा ने सदैव नारी को 'शक्ति' के केंद्र में रखा है। आज आवश्यकता केवल उन्हें अधिकार देने की नहीं, बल्कि उनके प्रति उस प्राचीन गौरवमयी दृष्टि को पुनः जागृत करने की है।