ईरान-इजराइल युद्ध: अब थाली पर संकट! तेल ही नहीं, 'खाद' की किल्लत बढ़ाएगी अनाज की कीमतें

मिडिल ईस्ट में भड़की ईरान-इजराइल युद्ध की चिंगारी अब केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह युद्ध भारत समेत पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए बड़ा खतरा बन गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही रुकने से उर्वरकों (Fertilizers) की सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा सकती है, जिसका सीधा असर आपकी रसोई के बजट पर पड़ेगा।

08 Mar 2026  |  115

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता मिडिल ईस्ट में भड़की ईरान-इजराइल युद्ध की चिंगारी अब केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह युद्ध भारत समेत पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए बड़ा खतरा बन गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही रुकने से उर्वरकों (Fertilizers) की सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा सकती है, जिसका सीधा असर आपकी रसोई के बजट पर पड़ेगा।

खाड़ी देश: सिर्फ तेल के कुएं नहीं, 'फर्टिलाइजर' का भी गढ़

दुनिया का ध्यान अक्सर तेल की कीमतों पर रहता है, लेकिन मिडिल ईस्ट के देश यूरिया, सल्फर और अमोनिया के सबसे बड़े वैश्विक सप्लायर हैं।

ईरान का दबदबा: ईरान दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अमोनिया उत्पादक है, जो फसलों के पोषण के लिए अनिवार्य है।

प्रमुख निर्यातक: सऊदी अरब, कतर, ओमान और यूएई से आने वाला यूरिया और अमोनिया वैश्विक कृषि की जान है। युद्ध लंबा खिंचने की स्थिति में इन देशों से उत्पादन और शिपिंग दोनों बाधित होंगे, जिससे वैश्विक स्तर पर अनाज की पैदावार गिर सकती है।

रूस और चीन से भी नहीं मिल रही राहत

अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद की कीमतें पहले ही आग उगल रही हैं। यूरोप में अमोनिया के दाम 725 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गए हैं। ऐसे में अन्य विकल्पों से भी उम्मीदें कम हैं:

चीन: दुनिया के इस बड़े प्लेयर ने फॉस्फेट के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है।

रूस: अपनी उत्पादन सीमाओं के कारण रूस इस भारी कमी को अकेले पूरा करने में सक्षम नहीं है।

कतर: यहां सल्फर का उत्पादन पहले ही गिर चुका है।

भारतीय कृषि पर मंडराते काले बादल

भारत अपनी कृषि जरूरतों के लिए आयात पर भारी निर्भरता रखता है। आंकड़ों का गणित इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है:

निर्भरता: भारत 100% पोटाश (MOP) और 60% डीएपी (DAP) के लिए विदेशों पर निर्भर है।

बढ़ती लागत: विशेषज्ञों का अनुमान है कि सप्लाई बाधित होने से यूरिया की कीमतों में 30% से 40% तक का उछाल आ सकता है।

दोहरी मार: महंगी खेती और कम पैदावार

इसका असर दो स्तरों पर होगा। यदि सरकार सब्सिडी बढ़ाती है, तो सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ेगा (पिछले वर्ष यह 1.9 लाख करोड़ रुपये था)। यदि सब्सिडी नहीं बढ़ी, तो किसानों के लिए खेती महंगी हो जाएगी। खाद की कमी या ऊंचे दामों के कारण यदि किसान कम उर्वरक इस्तेमाल करेंगे, तो अनाज का उत्पादन घटेगा, जिससे मंडियों में आपूर्ति कम होगी और खाद्य पदार्थों की महंगाई बेकाबू हो जाएगी।

संकट का सारांश:

क्षेत्रप्रभाव
खेतीखाद के दाम 40% तक बढ़ने की आशंका, लागत में भारी वृद्धि।
पैदावारखाद की किल्लत से फसलों का उत्पादन घटने का खतरा।
महंगाईअनाज, फल और सब्जियों की कीमतों में भारी उछाल संभव।
सरकारी खजानाफर्टिलाइजर सब्सिडी का बजट 2 लाख करोड़ के पार जा सकता है।

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