हरियाणा निकाय चुनाव: अब 'किंगमेकर' नहीं रहा NOTA, सर्वाधिक वोट मिलने पर भी दूसरा उम्मीदवार होगा विजयी

निकाय चुनावों में यदि नोटा (None of the Above) को सबसे अधिक वोट मिलते हैं, तो भी चुनाव रद्द नहीं किया जाएगा। ऐसी स्थिति में, नोटा के बाद दूसरे स्थान पर रहने वाले प्रत्याशी को ही निर्वाचित घोषित कर दिया जाएगा।

14 Apr 2026  |  23

 

चंडीगढ़ | मुख्य संवाददाता हरियाणा में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग ने एक बड़ा और नीतिगत बदलाव किया है। अब निकाय चुनावों में यदि नोटा (None of the Above) को सबसे अधिक वोट मिलते हैं, तो भी चुनाव रद्द नहीं किया जाएगा। ऐसी स्थिति में, नोटा के बाद दूसरे स्थान पर रहने वाले प्रत्याशी को ही निर्वाचित घोषित कर दिया जाएगा।

2018 की व्यवस्था हुई निरस्त राज्य निर्वाचन आयुक्त देवेन्द्र सिंह कल्याण ने 7 अप्रैल को एक नया आदेश जारी करते हुए नवंबर 2018 में लागू की गई पुरानी व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है। तत्कालीन आयुक्त डॉ. दलीप सिंह के समय यह नियम बनाया गया था कि यदि नोटा को सर्वाधिक वोट मिलते हैं, तो उस वार्ड का चुनाव रद्द कर दिया जाएगा और दोबारा चुनाव होगा, जिसमें पुराने प्रत्याशी भाग नहीं ले सकेंगे।

नया आदेश: क्या बदलेगा? राज्य निर्वाचन आयोग के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, चुनावी प्रक्रिया में अब नोटा की भूमिका केवल एक विकल्प तक सीमित रह जाएगी:

विजेता का चयन: यदि नोटा को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, तो चुनाव रद्द करने के बजाय दूसरे नंबर वाले उम्मीदवार को विजेता माना जाएगा।

जमानत राशि का गणित: नोटा को मिलने वाले वोटों को उम्मीदवारों की जमानत राशि बचाने के लिए आवश्यक 12.5 प्रतिशत न्यूनतम वोटों की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा।

EVM पर स्थिति: ईवीएम मशीन पर नोटा का बटन पहले की तरह सबसे अंत में मौजूद रहेगा, लेकिन इसके पास अब चुनाव रद्द कराने की 'शक्ति' नहीं होगी।

कानूनी पहलू और सुप्रीम कोर्ट का संदर्भ पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार के अनुसार, हरियाणा निर्वाचन आयोग ने 2018 में जो व्यवस्था लागू की थी, वह सुप्रीम कोर्ट के 2013 के 'पीयूसीएल बनाम भारत सरकार' मामले के निर्देशों से काफी आगे थी। सुप्रीम कोर्ट ने केवल नोटा का विकल्प देने का निर्देश दिया था, न कि नोटा के आधार पर चुनाव रद्द करने का।

"नया आदेश हरियाणा की चुनावी व्यवस्था को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित नियमों के समकक्ष ले आया है, जहाँ नोटा को एक प्रतीकात्मक विरोध माना जाता है, न कि चुनावी परिणाम को शून्य करने वाला कारक।"

निष्कर्ष आयोग के इस फैसले से अब उन स्थितियों पर विराम लग जाएगा जहाँ नोटा के कारण दोबारा चुनाव कराने का भारी वित्तीय और प्रशासनिक बोझ पड़ता था। हालांकि, यह बदलाव उन मतदाताओं के लिए एक संदेश भी है जो नोटा का उपयोग उम्मीदवारों को पूरी तरह खारिज करने के हथियार के रूप में करते थे।

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