नक्सलवाद का सूर्यास्त: 180 से सिमटकर 38 जिलों तक पहुंचा उग्रवाद, 'शून्य सहनशीलता' और विकास ने बदली तस्वीर, गृह मंत्रालय की बहुआयामी रणनीति

सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के अनुसार, जो आंदोलन कभी देश के 180 जिलों को अपनी चपेट में लिए हुए था, वह अब केवल 38 गंभीर रूप से प्रभावित जिलों तक सिमट गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में 'शून्य सहनशीलता' (Zero Tolerance) की नीति और 'विकास' के दोहरे प्रहार ने इस ऐतिहासिक सफलता की पटकथा लिखी है।

14 Apr 2026  |  23

 

नई दिल्ली: भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए कभी सबसे बड़ी चुनौती रहा नक्सलवाद (वामपंथी उग्रवाद) अब अपने अंतिम दौर में है। सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के अनुसार, जो आंदोलन कभी देश के 180 जिलों को अपनी चपेट में लिए हुए था, वह अब केवल 38 गंभीर रूप से प्रभावित जिलों तक सिमट गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में 'शून्य सहनशीलता' (Zero Tolerance) की नीति और 'विकास' के दोहरे प्रहार ने इस ऐतिहासिक सफलता की पटकथा लिखी है।

सुरक्षा और सफलता के आंकड़े: टूटती नक्सलवाद की कमर

पिछले एक दशक में सुरक्षा बलों के समन्वित अभियानों और सटीक खुफिया जानकारी (Intelligence) ने नक्सलियों के नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया है।

हिंसा में गिरावट: नक्सली हिंसा की घटनाओं में 70% से अधिक और सुरक्षा संबंधी मौतों में लगभग 80% की भारी कमी आई है।

2024-25 का एक्शन: वर्ष 2024 में 290 नक्सली मारे गए और 1,000 से अधिक को गिरफ्तार किया गया।

ऐतिहासिक आत्मसमर्पण: सबसे बड़ी कामयाबी वैचारिक मोर्चे पर मिली है। 2025 तक आत्मसमर्पण करने वालों की संख्या 2,000 के पार पहुंच गई है, जो यह दर्शाता है कि अब उग्रवादी विचारधारा अपना जनाधार खो रही है।

विकास की 'भाग्य रेखाएं': ₹11,700 करोड़ का रोड प्रोजेक्ट

सरकार का मानना है कि स्थायी शांति केवल समावेशी विकास से ही संभव है। गृह मंत्रालय ने उन क्षेत्रों को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बुनियादी ढांचे पर विशेष जोर दिया है:

सड़कें और कनेक्टिविटी: ₹11,700 करोड़ से अधिक की लागत से दूरस्थ क्षेत्रों में 17,589 किमी सड़कों को मंजूरी दी गई, जिनमें से 12,000 किमी से अधिक का निर्माण पूरा हो चुका है।

डिजिटल क्रांति: दुर्गम क्षेत्रों में लगभग 5,000 मोबाइल टावर लगाए जा चुके हैं और 8,000 नए 4G टावरों को मंजूरी दी गई है।

वित्तीय समावेशन: औपचारिक अर्थव्यवस्था को गांवों तक पहुंचाने के लिए 1,804 बैंक शाखाएं, 1,321 एटीएम और 6,025 डाकघर खोले गए हैं।

शिक्षा और कौशल: सशक्त होता युवा

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के युवाओं को बंदूक के बजाय पेन थमाने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक निवेश किया गया है।

एकलव्य स्कूल: आदिवासी छात्रों के लिए 259 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) बनाए गए हैं।

कौशल विकास: आईटीआई और प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से युवाओं को रोजगार के काबिल बनाया जा रहा है, ताकि वे उग्रवादी विचारधारा के बहकावे में न आएं।

सामुदायिक विश्वास: 'नियद नेल्लानार योजना' जैसी पहलों ने स्थानीय जनता और सरकार के बीच विश्वास की खाई को पाट दिया है। अब ग्रामीण क्षेत्रों के लोग खुद सुरक्षा और विकास की मांग कर रहे हैं।

निष्कर्ष: मुख्यधारा की ओर बढ़ते कदम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और गृह मंत्रालय की रणनीति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंसा का रास्ता चुनने वालों के लिए कोई जगह नहीं है, जबकि मुख्यधारा में लौटने वालों के लिए पुनर्वास के दरवाजे खुले हैं। सड़कों, स्कूलों और डिजिटल सेवाओं के विस्तार ने 'रेड कॉरिडोर' को 'विकास कॉरिडोर' में बदल दिया है। वह दिन दूर नहीं जब नक्सलवाद भारत के इतिहास का एक बंद अध्याय होगा।

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