हरियाणा नगर निगम चुनाव: आरक्षण के 'डेटा आधार' पर कानूनी जंग, हाई कोर्ट में सरकार की प्रक्रिया को चुनौती

राज्य सरकार द्वारा सीटों के निर्धारण और आरक्षण के लिए जनगणना के बजाय फैमिली इंफॉर्मेशन डेटा रिपॉजिटरी (FIDR) के उपयोग को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। पूर्व पार्षद उषा रानी सहित कई याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर इस याचिका पर हाई कोर्ट की अवकाशकालीन बेंच आज सुनवाई करेगी।

15 Apr 2026  |  21

 

चंडीगढ़: हरियाणा में होने वाले नगर निगम चुनावों की दहलीज पर एक बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार द्वारा सीटों के निर्धारण और आरक्षण के लिए जनगणना के बजाय फैमिली इंफॉर्मेशन डेटा रिपॉजिटरी (FIDR) के उपयोग को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। पूर्व पार्षद उषा रानी सहित कई याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर इस याचिका पर हाई कोर्ट की अवकाशकालीन बेंच आज सुनवाई करेगी।

संवैधानिक प्रावधान बनाम सरकारी संशोधन

याचिका में उठाए गए कानूनी बिंदुओं के अनुसार, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243-पी स्पष्ट करता है कि "जनसंख्या" का अर्थ केवल अंतिम प्रकाशित जनगणना (Census) के आंकड़ों से है।

विवाद का केंद्र: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि राज्य सरकार ने 2023 और 2024 में हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 में संशोधन कर जनगणना की जगह FIDR डेटा को आधार बना लिया है, जो सीधे तौर पर असंवैधानिक है।

पारदर्शिता पर सवाल: आरोप है कि बिना किसी नई आधिकारिक जनगणना के डेटा में बदलाव करना चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को प्रभावित करता है।

पंचकूला वार्ड परिसीमन कठघरे में

याचिका में विशेष रूप से पंचकूला नगर निगम के वार्ड परिसीमन पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि:

परिसीमन के दौरान आई आपत्तियों पर विचार किए बिना ही अंतिम अधिसूचना जारी कर दी गई।

वार्डों के निर्धारण में भौगोलिक एकरूपता और जनसंख्या अनुपात जैसे सिद्धांतों की पूरी तरह अनदेखी की गई।

यह प्रक्रिया 1994 के स्थापित नियमों का सीधा उल्लंघन है।

आरक्षण प्रक्रिया पर भेदभाव के आरोप

याचिका में 10 अप्रैल 2026 को जारी उस अधिसूचना को भी चुनौती दी गई है, जिसमें केवल अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीटों की घोषणा की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सामान्य और पिछड़ा वर्ग (BC-A और BC-B) के लिए आरक्षण की घोषणा एक साथ न करना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। इसके अलावा, मेयर पद के लिए 'ड्रॉ ऑफ लॉट्स' (चिट्ठी प्रक्रिया) को पूरे राज्य में एक साथ लागू न कर केवल कुछ निगमों तक सीमित रखने को भी 'चुनावी ढांचे' के विपरीत बताया गया है।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांगें

हाई कोर्ट से इस मामले में हस्तक्षेप की अपील करते हुए याचिकाकर्ताओं ने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:

पंचकूला सहित सभी नगर निगमों की सीटों का निर्धारण 2011 की जनगणना के आधार पर ही किया जाए।

FIDR डेटा के आधार पर किए गए आरक्षण और परिसीमन को रद्द किया जाए।

जब तक अदालत इस मामले में अंतिम निर्णय नहीं ले लेती, तब तक चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।

निष्कर्ष: इस याचिका के परिणाम न केवल पंचकूला, बल्कि पूरे हरियाणा की नगर निकाय चुनावी प्रक्रिया की दिशा तय करेंगे। यदि हाई कोर्ट याचिकाकर्ताओं के तर्कों से सहमत होता है, तो राज्य सरकार को अपनी पूरी चुनावी तैयारी और डेटा नीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

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