अंतरिक्ष में बढ़ता 'ट्रैफिक जाम': 2025 में भारतीय सैटेलाइट्स पर मंडराया 1.5 लाख बार खतरा, इसरो को 18 बार बदलनी पड़ी राह

ISRO की ताजा रिपोर्ट 'ISSAR-2025' के अनुसार, अंतरिक्ष में बढ़ती भीड़ और मलबे (Space Debris) के कारण भारतीय उपग्रहों की सुरक्षा पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। वर्ष 2025 में भारतीय अंतरिक्ष संपत्तियों को सुरक्षित रखने के लिए इसरो को अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

17 Apr 2026  |  3

 

बेंगलुरु: पृथ्वी की कक्षा अब केवल उपग्रहों का ठिकाना नहीं, बल्कि मलबे का एक खतरनाक जाल बनती जा रही है। इसरो (ISRO) की ताजा रिपोर्ट 'ISSAR-2025' के अनुसार, अंतरिक्ष में बढ़ती भीड़ और मलबे (Space Debris) के कारण भारतीय उपग्रहों की सुरक्षा पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। वर्ष 2025 में भारतीय अंतरिक्ष संपत्तियों को सुरक्षित रखने के लिए इसरो को अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

1.5 लाख अलर्ट और 'कोलिजन अवॉइडेंस मैन्यूवर'

यूएस स्पेस कमांड के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में भारतीय सैटेलाइट्स के करीब से मलबे के गुजरने के 1.5 लाख से अधिक अलर्ट प्राप्त हुए। इन खतरों से बचने के लिए इसरो को कुल 18 बार 'कोलिजन अवॉइडेंस मैन्यूवर' (CAM) को अंजाम देना पड़ा।

लो अर्थ ऑर्बिट (LEO): 14 बार दिशा बदली गई।

जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट (GEO): 4 बार मैन्यूवर किए गए।

महत्वपूर्ण मिशन: $1.2 बिलियन की लागत वाले NISAR सैटेलाइट को भी टक्कर से बचाने के लिए अपनी निर्धारित कक्षा बदलनी पड़ी।

ईंधन की खपत और कम होती सैटेलाइट की उम्र

अंतरिक्ष वैज्ञानिक बताते हैं कि मलबे की रफ्तार लगभग 28,000 किमी प्रति घंटा होती है। ऐसे में छोटे से टुकड़े की टक्कर भी सैटेलाइट को तबाह कर सकती है। टक्कर से बचने के लिए जब सैटेलाइट अपने थ्रस्टर्स जलाकर रास्ता बदलता है, तो उसका कीमती ईंधन खर्च होता है। चूंकि सैटेलाइट में ईंधन सीमित होता है, इसलिए हर अतिरिक्त मैन्यूवर उसकी कार्यशील उम्र (Lifespan) को कम कर देता है।

लॉन्चिंग में देरी: 41 सेकंड का वह ठहराव

अंतरिक्ष का कचरा अब केवल कक्षा में ही नहीं, बल्कि लॉन्चिंग के समय भी बाधा बन रहा है। 2025 में इसरो के LVM3-M6 मिशन के दौरान मलबे से सुरक्षित दूरी सुनिश्चित करने के लिए लिफ्ट-ऑफ को 41 सेकंड तक टालना पड़ा। इसके अतिरिक्त, चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर को अन्य देशों के मलबे और सैटेलाइट्स से बचाने के लिए 16 बार ऑर्बिट प्लानिंग बदलनी पड़ी।

अंतरिक्ष: कचरे का बढ़ता डिब्बा

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 की रिपोर्ट और इसरो के आंकड़े डराने वाले हैं:

अंतरिक्ष में 10 सेमी से बड़े 40,000 और 1 सेमी से बड़े लगभग 12 लाख मलबे के टुकड़े मौजूद हैं।

2025 में ही 4,198 नए सैटेलाइट लॉन्च किए गए, जिससे भीड़ और बढ़ गई है।

अकेले SpaceX के स्टारलिंक प्रोजेक्ट के 9,396 सैटेलाइट्स वर्तमान में कक्षा में सक्रिय हैं।

'नेत्र' प्रोजेक्ट: भारत का सुरक्षा कवच

इस संकट से निपटने के लिए भारत अपने स्वदेशी प्रोजेक्ट नेत्र (NETRA) को मजबूत कर रहा है। इसके तहत:

10 सेंटीमीटर तक के छोटे मलबे की रियल-टाइम ट्रैकिंग संभव होगी।

भविष्य के सैटेलाइट्स में अतिरिक्त ईंधन और मिशन अंत के बाद उन्हें डी-ऑर्बिट (वापस वातावरण में जला देना) करने की तकनीक पर काम हो रहा है।

वैश्विक प्रयास: जहाँ अमेरिका रडार नेटवर्क से निगरानी कर रहा है, वहीं यूरोप 2030 तक मलबा हटाने वाले रोबोटिक सिस्टम और चीन लेजर आधारित तकनीक पर काम कर रहा है। जापान भी चुंबकीय तकनीक के जरिए मलबे को पृथ्वी की ओर खींचकर नष्ट करने के प्रयोग कर रहा है।

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