युद्ध की तपिश से पिघला शहद उद्योग: निर्यात ठप, हरियाणा के गोदामों में फंसा हजारों टन 'लिक्विड गोल्ड'

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध की आहट ने अब हरियाणा के खेतों और बागानों में पल रहे 'सुनहरे' उद्योग पर काला साया डाल दिया है। इजराइल, ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष का सीधा प्रहार हरियाणा के शहद उद्योग पर हुआ है, जिससे हजारों परिवारों की रोजी-रोटी संकट में आ गई है।

19 Apr 2026  |  12

 

 

कुरुक्षेत्र/हरियाणा। पश्चिम एशिया में जारी वैश्विक अस्थिरता और युद्ध के कारण हरियाणा का समृद्ध शहद उद्योग अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग घटने और निर्यात प्रक्रिया बाधित होने से प्रदेश का हजारों टन शहद गोदामों में डंप पड़ा है। मधुमक्खी पालकों को न केवल भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, बल्कि आने वाले सीजन को लेकर भी उनके मन में गहरी चिंता व्याप्त है।

आंकड़ों में संकट का विश्लेषण

हरियाणा शहद उत्पादन के मामले में देश का एक प्रमुख केंद्र है, लेकिन मौजूदा हालातों ने समीकरण बिगाड़ दिए हैं:

सक्रिय पालक: प्रदेश में लगभग 45 हजार मधुमक्खी पालक इस व्यवसाय से जुड़े हैं।

बड़ा उत्पादन: हरियाणा में सालाना करीब 55 हजार टन शहद का उत्पादन होता है।

निर्यात का गणित: सामान्यतः उत्पादन का लगभग 90% हिस्सा विदेशों में भेजा जाता है, जिसमें से 35 हजार टन अकेले निर्यात के लिए होता है। युद्ध के कारण यह पूरी सप्लाई चेन अब टूट चुकी है।

दोहरी मार: अमेरिकी शुल्क और अब वैश्विक युद्ध

व्यवसायियों का कहना है कि यह उद्योग पहले ही उस समय संकट में आ गया था जब अमेरिका ने भारतीय शहद के आयात पर 50 प्रतिशत शुल्क लगा दिया था। अब पश्चिम एशिया के तनाव ने 'कोढ़ में खाज' का काम किया है।

"उत्पादन और लागत में कोई कमी नहीं आई है। मधुमक्खियों के लिए फीड, ट्रांसपोर्टेशन और लेबर का खर्च पहले जैसा ही है, लेकिन बिक्री न होने से आर्थिक दबाव असहनीय हो गया है।" — सुभाष कांबोज, उपाध्यक्ष (कान्फेडरेशन आफ एग्रीकल्चर इंडस्ट्री)।

सरसों की फसल और राज्यों में शिफ्टिंग की चुनौती

हरियाणा के शहद उत्पादन में सरसों का योगदान 60 प्रतिशत है। सीजन के दौरान मधुमक्खी पालकों को अपने बॉक्स पंजाब, यूपी, एमपी और राजस्थान जैसे राज्यों में शिफ्ट करने पड़ते हैं। इस प्रक्रिया में परिवहन और श्रम का भारी खर्च आता है, साथ ही जान-माल का जोखिम भी बना रहता है। इस बार उत्पादन तो अच्छा हुआ, लेकिन खरीदार न होने से सारा निवेश फंस गया है।

कृषि और पर्यावरण पर मंडराता खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार, मधुमक्खी पालन सिर्फ एक व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह परागण (Pollination) के जरिए फसल उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। यदि यह उद्योग कमजोर पड़ता है, तो इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन पर पड़ेगा।

सरकार से राहत की गुहार

कुरुक्षेत्र के रामनगर में स्थित हनी ट्रेड सेंटर में भी सन्नाटा पसरा हुआ है। उद्योग से जुड़े लोगों ने सरकार से मांग की है कि इस संकट की घड़ी में मधुमक्खी पालकों को विशेष पैकेज या सब्सिडी दी जाए, ताकि वे फीडिंग और लेबर जैसे बुनियादी खर्चे उठा सकें।

निष्कर्ष: अगर वैश्विक हालात जल्द नहीं सुधरे और सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो हरियाणा का यह फलता-फूलता उद्योग अंधकार में समा सकता है।

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