नई दिल्ली: लोकसभा में 'संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक' के गिरने के बाद महिला आरक्षण के मुद्दे पर देश में राजनीतिक पारा चढ़ गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। जहाँ कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने आरक्षण लागू होने पर अपनी सीट छोड़ने की चुनौती दी है, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिल की विफलता को 'नारी शक्ति' के सपनों पर प्रहार बताया है।
"क्या मोदी और शाह अपनी सीटें छोड़ेंगे?" - मणिकम टैगोर
कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक पोस्ट के जरिए सरकार को घेरा। उन्होंने एक बड़ी पेशकश करते हुए कहा:
सीट छोड़ने का प्रस्ताव: टैगोर ने कहा कि यदि मौजूदा 543 सीटों पर ही 33% आरक्षण तुरंत लागू होता है, तो वह अपनी विरुधुनगर सीट किसी महिला उम्मीदवार के लिए छोड़ने को तैयार हैं।
दिग्गजों से सवाल: उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए पूछा कि क्या वे वाराणसी और गांधीनगर की सीटें छोड़ने का साहस दिखाएंगे?
परिसिमन (Delimitation) पर आपत्ति: टैगोर ने सरकार पर 'ध्यान भटकाने वाली रणनीति' का आरोप लगाया और कहा कि आरक्षण सांकेतिक नहीं बल्कि वास्तविक होना चाहिए, जिसमें देरी के लिए सीटों की संख्या बढ़ाने जैसे बहाने न बनाए जाएं।
क्यों गिरा बिल? आंकड़ों का गणित
महिला आरक्षण से जुड़े इस महत्वपूर्ण विधेयक को पारित होने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी, जिसे हासिल करने में सरकार विफल रही।
पक्ष में वोट: 298
विरोध में वोट: 230
प्रस्ताव क्या था? बिल में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने और 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान था। इस हार के बाद सरकार ने इससे संबंधित दो अन्य विधेयकों को भी आगे न बढ़ाने का फैसला किया है।
पीएम मोदी का संबोधन: "विपक्ष ने महिलाओं के सपनों को कुचला"
विधेयक गिरने के बाद राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी दलों पर कड़ा प्रहार किया। उनके संबोधन के मुख्य बिंदु रहे:
सपनों पर कुठाराघात: पीएम ने कहा कि सरकार की ईमानदारी के बावजूद विपक्ष ने महिलाओं के सपनों और उनके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाई है।
वोटर याद रखेंगे अपमान: उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि देश की नारी शक्ति अपनी शान के इस अपमान को याद रखेगी।
कांग्रेस पर निशाना: पीएम ने कांग्रेस की कार्यशैली को "देरी, ध्यान भटकाना और रुकावट" (Delay, Diversion, Disruption) की राजनीति करार देते हुए कहा कि विपक्षी दलों ने हमेशा सुधारों में अड़ंगा डाला है।
निष्कर्ष: असली प्रतिनिधित्व बनाम राजनीतिक सुविधा
वर्तमान में यह बहस दो धड़ों में बंट गई है। विपक्ष का तर्क है कि आरक्षण को बिना किसी देरी (परिसीमन) के मौजूदा सीटों पर लागू किया जाए, जबकि सरकार का पक्ष है कि 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के माध्यम से सीटों की संख्या बढ़ाकर प्रतिनिधित्व को और मजबूत किया जाना चाहिए।
इस राजनीतिक गतिरोध ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में महिला आरक्षण चुनाव का एक प्रमुख और संवेदनशील मुद्दा बना रहेगा।