नई दिल्ली: महिला आरक्षण बिल को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक संग्राम तेज हो गया है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर इस बिल को "जानबूझकर लटकाने" और "विभाजनकारी शर्तें" थोपने का गंभीर आरोप लगाया है। पार्टी ने मांग की है कि वर्तमान की 543 लोकसभा सीटों पर बिना किसी देरी के तत्काल एक-तिहाई आरक्षण लागू किया जाए।
कांग्रेस का देशव्यापी अभियान: 'काउंटर अटैक' की तैयारी
विधेयक के पारित न हो पाने के बाद कांग्रेस ने जनता के बीच जाने का निर्णय लिया है।
29 शहरों में प्रेस कॉन्फ्रेंस: बुधवार (21 अप्रैल) को देश के प्रमुख शहरों में कांग्रेस के बड़े नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे।
जन-जागरण: पार्टी पंपलेट, रैलियों और व्यापक प्रचार-प्रसार के जरिए बिल की "शर्तों" की सच्चाई जनता के सामने रखेगी।
"परिसीमन और जनगणना की शर्तें क्यों?"
कांग्रेस ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि 2023 में पारित होने के बावजूद इसे अब तक अधिसूचित करने में देरी की गई (अधिसूचना 16 अप्रैल 2026 को जारी)।
"सरकार महिला सशक्तिकरण का ढोंग कर रही है। यदि नीयत साफ है, तो तत्काल 181 सीटें महिलाओं को क्यों नहीं दी जा रही हैं? परिसीमन की शर्त केवल दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों के प्रतिनिधित्व को कम करने की एक साजिश है।" - कांग्रेस प्रवक्ता
पिछड़ा वर्ग और जातिगत जनगणना का मुद्दा
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी पिछड़े वर्ग की महिलाओं को उनका हक देने से कतई बचना चाहते हैं। पार्टी के अनुसार, यदि जातिगत जनगणना के आधार पर आरक्षण मिलता है, तो पिछड़ी महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित होगी, जिसे सरकार स्वीकार नहीं कर पा रही है।
महिला सुरक्षा पर घेरा
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कांग्रेस प्रधानमंत्री की "चुप्पी" पर भी सवाल उठाएगी। पार्टी ने निम्नलिखित मुद्दों को उठाने का संकल्प लिया है:
मणिपुर हिंसा और हाथरस कांड।
महिला पहलवानों का विरोध प्रदर्शन।
बृजभूषण शरण सिंह और बिलकिस बानो मामला।
अंकिता भंडारी हत्याकांड।
आंकड़ों के जरिए प्रहार
कांग्रेस ने बीजेपी के भीतर महिला प्रतिनिधित्व के आंकड़ों को पेश करते हुए कटाक्ष किया:
सांसद: बीजेपी के 240 सांसदों में केवल 12.9% (31) महिलाएं हैं।
मंत्री: 72 मंत्रियों के मंत्रिमंडल में केवल 7 महिलाएं हैं।
इतिहास: कांग्रेस ने याद दिलाया कि पंचायतों में आज जो 15 लाख महिला प्रतिनिधि हैं, वह राजीव गांधी द्वारा लाए गए 73वें और 74वें संशोधन की देन हैं, जिसका तत्कालीन बीजेपी नेताओं ने विरोध किया था।
निष्कर्ष: कांग्रेस ने सरकार को चुनौती दी है कि वह आरक्षण के पीछे छिपने के बजाय महंगाई, बेरोजगारी और एलपीजी संकट जैसे बुनियादी मुद्दों पर महिलाओं का सामना करे। इस सियासी खींचतान ने आने वाले चुनाव और महिला सशक्तिकरण की बहस को एक नई दिशा दे दी है।