कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के समर में 'इंडिया' ब्लॉक के दो प्रमुख घटक दलों— कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (TMC)— के बीच रिश्तों के समीकरण रातों-रात बदलते नजर आ रहे हैं। कल तक एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक दिख रहे इन दलों के बीच 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (महिला आरक्षण बिल) और परिसीमन के मुद्दे ने सेतु का काम किया है।
आक्रामकता से अचानक 'मौन' तक का सफर
चुनाव की शुरुआत में जब ममता बनर्जी ने बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया, तो कांग्रेस नेतृत्व ने भी कड़े तेवर दिखाए थे। 14 अप्रैल को मालदा और मुर्शिदाबाद की रैलियों में राहुल गांधी ने भाजपा के साथ-साथ ममता सरकार पर भी जमकर निशाना साधा था। कांग्रेस ने मुस्लिम बहुल इलाकों में राहुल-प्रियंका और दलित-आदिवासी क्षेत्रों में मल्लिकार्जुन खरगे की रैलियों का बड़ा मास्टर प्लान तैयार किया था।
वो एक घटना, जिसने बदल दी रणनीति
रिश्तों में जमी बर्फ तब पिघलनी शुरू हुई जब महिला आरक्षण और परिसीमन के मुद्दे पर राहुल गांधी के एक 'टोकने' पर ममता बनर्जी ने अभूतपूर्व प्रतिक्रिया दी।
सांसदों की एकजुटता: टीएमसी ने बिल के विरोध में अपने केवल 5 नहीं, बल्कि 21 सांसद भेजकर संविधान संशोधन के खिलाफ वोट कराया।
सोनिया-राहुल का आभार: इस एकजुटता के बाद सोनिया गांधी ने खुद ममता बनर्जी को और राहुल गांधी ने अभिषेक बनर्जी को फोन कर धन्यवाद दिया।
बंगाल से गांधी परिवार की 'रणनीतिक दूरी'
इस धन्यवाद कॉल के बाद बंगाल में कांग्रेस के प्रचार का स्वरूप पूरी तरह बदल गया:
रद्द हुए कार्यक्रम: 14 अप्रैल के बाद राहुल गांधी दोबारा बंगाल नहीं गए और प्रियंका गांधी के सभी चुनावी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए।
निशाने पर सिर्फ भाजपा: मल्लिकार्जुन खरगे ने जब दोबारा बंगाल का रुख किया, तो उनके भाषणों से ममता सरकार का जिक्र लगभग गायब रहा और पूरा फोकस भाजपा पर केंद्रित हो गया।
सेकुलर ताकतों की मजबूती: राहुल गांधी के दफ्तर से जुड़े सूत्रों का अब कहना है कि वे किसी भी कीमत पर धर्मनिरपेक्ष ताकतों को कमजोर नहीं करना चाहते।
अधीर रंजन चौधरी की 'असहजता'
हाईकमान के इस बदले रुख ने बंगाल कांग्रेस के दिग्गज नेता और ममता बनर्जी के धुर विरोधी अधीर रंजन चौधरी को बेहद असहज स्थिति में डाल दिया है।
पुरानी रंजिश: ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव में पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान को उतारकर अधीर को शिकस्त दी थी।
अकेले लड़ने की जिद: अधीर रंजन चौधरी अब बरहामपुर से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं और वे टीएमसी-भाजपा के बीच 'नूराकुश्ती' को मुख्य मुद्दा बना रहे हैं। हालांकि, दिल्ली में आलाकमान की टीएमसी के प्रति नरम पड़ती नीति पर सवाल पूछे जाने पर वे अपनी नाराजगी छिपा नहीं पा रहे हैं।
निष्कर्ष: आज पहले चरण के प्रचार का आखिरी दिन है और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की बंगाल से अनुपस्थिति चीख-चीखकर कह रही है कि राष्ट्रीय राजनीति की मजबूरियों और महिला आरक्षण जैसे साझा मुद्दों ने फिलहाल बंगाल की स्थानीय प्रतिद्वंद्विता पर पर्दा डाल दिया है।
सवाल: आपको क्या लगता है, क्या दिल्ली में कांग्रेस-TMC की यह 'दोस्ती' बंगाल के जमीनी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और अधीर रंजन जैसे नेताओं के मनोबल पर भारी पड़ेगी?