बंपर पैदावार पर 'लाल सागर' का साया: हरियाणा के किसानों का रिकॉर्ड प्याज उत्पादन वैश्विक तनाव की भेंट चढ़ा

राज्य में 39.89 टन प्रति हेक्टेयर तक का रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज किया गया है, हरियाणा अब प्याज उत्पादन के मामले में देश के अग्रणी राज्यों की कतार में खड़ा है। लाल सागर (Red Sea) में जारी संघर्ष और ईरान-इजरायल विवाद ने स्थानीय मंडियों के गणित को बिगाड़ दिया है। निर्यात बाधित होने से अब किसानों को घरेलू बाजार में कीमतों के धड़ाम होने का डर सता रहा है।

24 Apr 2026  |  14

 

करनाल/चंडीगढ़: हरियाणा के मेहनतकश किसानों ने इस साल रबी सीजन में प्याज उत्पादन के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं, लेकिन उनकी यह खुशी अंतरराष्ट्रीय युद्ध और तनाव के बादलों में छिपी नजर आ रही है। हजारों मील दूर लाल सागर (Red Sea) में जारी संघर्ष और ईरान-इजरायल विवाद ने स्थानीय मंडियों के गणित को बिगाड़ दिया है। निर्यात बाधित होने से अब किसानों को घरेलू बाजार में कीमतों के धड़ाम होने का डर सता रहा है।

उत्पादन में रिकॉर्ड: देश को टक्कर दे रहा हरियाणा

हरियाणा अब प्याज उत्पादन के मामले में देश के अग्रणी राज्यों की कतार में खड़ा है। देश के कुल प्याज उत्पादन में राज्य की 3.4% हिस्सेदारी है।

प्रमुख उत्पादक जिले: करनाल, नूंह, गुरुग्राम, अंबाला और फतेहाबाद।

बंपर उत्पादकता: राज्य में 39.89 टन प्रति हेक्टेयर तक का रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज किया गया है, जो कई राज्यों के राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है।

क्षेत्रफल: लगभग 22 से 24 हजार हेक्टेयर भूमि पर प्याज की खेती हो रही है।

निर्यात की राह में 'समुद्री संकट'

ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण समुद्री व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हो गए हैं। जहाजों को अब लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप:

भाड़े में भारी उछाल: समुद्री माल ढुलाई का किराया 8,000 से 9,000 डॉलर प्रति कंटेनर तक पहुंच गया है।

महंगा हुआ निर्यात: ढुलाई खर्च बढ़ने से भारतीय प्याज वैश्विक बाजार में महंगा हो गया है, जिससे विदेशी खरीदार कम हो रहे हैं।

सप्लाई चेन टूटी: यदि रबी की बंपर फसल अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक नहीं पहुंची, तो घरेलू मंडियों में माल 'डंप' होने से कीमतें गिर जाएंगी।

रणनीतिक कदम: खाड़ी देशों को राहत की तैयारी

खाड़ी देशों में प्याज की किल्लत को देखते हुए केंद्र सरकार ने रणनीतिक पहल की है। सरकार सप्लाई चेन को बहाल करने और मित्र देशों (खासकर यूएई) को राहत देने के लिए लगभग 50,000 टन अतिरिक्त प्याज निर्यात करने का प्रयास कर रही है। हालांकि, लॉजिस्टिक्स की चुनौतियां अब भी बरकरार हैं।

विशेषज्ञ की राय: "सुनिश्चित बाजार की जरूरत"

राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (करनाल) के पूर्व निदेशक डॉ. बीके दुबे का मानना है कि सरकार को इस संकट में हस्तक्षेप करना चाहिए। उन्होंने कहा:

"सरकार को निर्यात शुल्क में कटौती और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट देकर किसानों को बचाना होगा। यदि समय रहते खाड़ी देशों तक पहुंच सुलभ नहीं हुई, तो यह बंपर फसल किसानों के लिए बदहाली का कारण बन जाएगी। किसान को आज सिर्फ पैदावार की नहीं, बल्कि सुनिश्चित बाजार की जरूरत है।"

भविष्य पर सवाल

वर्तमान संकट ने खरीफ सीजन की दहलीज पर खड़े किसानों को दुविधा में डाल दिया है। क्या इस अनिश्चितता के बीच किसान दोबारा प्याज बोने का जोखिम उठाएगा? इसका सीधा असर आने वाले समय में प्याज की कीमतों और उपलब्धता पर पड़ना तय है।

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