मुंबई: भारतीय रुपया वर्तमान में एक गंभीर आर्थिक चक्रवात का सामना कर रहा है। मध्य पूर्व (Middle East) में जारी अस्थिरता ने न केवल तेल की कीमतों में आग लगाई है, बल्कि विदेशी निवेशकों के भरोसे को भी हिला दिया है। RBI के बुलेटिन के अनुसार, रुपये का वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER) गिरकर 92.72 के स्तर पर आ गया है, जो पिछले 10 से अधिक वर्षों का सबसे निचला स्तर है।
रुपये के गिरने के 3 मुख्य कारण
कच्चे तेल में उबाल: ईरान संकट और 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' में सप्लाई रुकने के डर से ब्रेंट क्रूड की कीमतें $106 प्रति बैरल के पार पहुँच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का 80% तेल आयात करता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है।
विदेशी निवेशकों (FPI) की निकासी: वैश्विक अनिश्चितता के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से बड़े पैमाने पर पैसा निकाला है। निवेशक अब जोखिम वाली संपत्तियों (रुपया) के बजाय सुरक्षित निवेश (डॉलर और सोना) की ओर भाग रहे हैं।
REER में गिरावट: 40-करेंसी बास्केट पर आधारित REER का गिरना यह दिखाता है कि व्यापारिक दृष्टिकोण से रुपया अपनी वास्तविक वैल्यू खो रहा है। यह अब अपने दीर्घकालिक औसत 98.25 से काफी नीचे है।
प्रमुख आंकड़े और वर्तमान स्थिति (24 अप्रैल 2026)
| विवरण | वर्तमान स्थिति / डेटा |
|---|---|
| USD/INR विनिमय दर | ₹94.27 (प्रति डॉलर के करीब) |
| 40-करेंसी REER | 92.72 (दशक का निचला स्तर) |
| 6-करेंसी REER | 89.61 (अप्रैल 2015 के बाद सबसे कम) |
| कच्चा तेल (Brent) | $106.30 प्रति बैरल (1.17% की वृद्धि) |
| रुपये में साल भर की गिरावट | लगभग 4.5% |
अर्थव्यवस्था पर असर: सस्ता एक्सपोर्ट, महंगा इम्पोर्ट
विशेषज्ञों के अनुसार, कमजोर REER के दो पहलू हैं:
सकारात्मक: भारत का निर्यात (Export) वैश्विक बाजार में सस्ता और अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाता है, जिससे निर्यातकों को फायदा हो सकता है।
नकारात्मक: आयात (Import) काफी महंगा हो जाता है, जिससे घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ सकती है। विशेष रूप से पेट्रोल, डीजल और इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
क्या जल्द होगा सुधार?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल सुधार की उम्मीद कम है। BofA Global Research के अनुसार, जब तक डॉलर की मांग और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आती, तब तक रुपया दबाव में रहेगा। मार्च 2026 में रुपया 95.21 के रिकॉर्ड निचले स्तर को भी छू चुका है।
निष्कर्ष: 2024-25 में अमेरिका, चीन और यूएई जैसे बड़े ट्रेड पार्टनर्स के साथ व्यापारिक संतुलन बनाए रखने के लिए रुपये की स्थिरता अनिवार्य है। RBI फिलहाल विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर गिरावट को रोकने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक हालात रुपये की दिशा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।