'हाई-इंटीग्रिटी' क्रेडिट पर जोर , किस तरह कृषि-आधारित कार्बन बाज़ारों के लिए एक परीक्षण-स्थल के रूप में उभर रहा है भारत

30 मिलियन डॉलर का चावल कार्बन क्रेडिट सौदा भारत के कृषि क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। अमेज़न का यह कदम बाजार से सीधे क्रेडिट खरीदने के बजाय खुद की आपूर्ति (Supply) बनाने के लिए परियोजनाओं में निवेश करने की नई कॉर्पोरेट प्रवृत्ति को दर्शाता है।

24 Apr 2026  |  20

अमेज़न (Amazon) और बायर (Bayer) द्वारा समर्थित 'द गुड राइस अलायंस' (TGRA) के बीच 30 मिलियन डॉलर का चावल कार्बन क्रेडिट सौदा भारत के कृषि क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। यह सौदा न केवल जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह भारत को वैश्विक कृषि-आधारित कार्बन बाजार के केंद्र में भी खड़ा करता है।

1. सौदे का मुख्य विवरण

खरीदार: अमेज़न (मुख्य खरीदार)।

लक्ष्य: 13,000 भारतीय चावल किसानों द्वारा 35,000 हेक्टेयर भूमि पर उत्पन्न 6,85,000 टन कार्बन डाइऑक्साइड-समकक्ष क्रेडिट खरीदना।

तकनीक: ये क्रेडिट मीथेन उत्सर्जन (Methane emissions) को कम करने वाली कृषि तकनीकों से प्राप्त होंगे, विशेष रूप से धान के खेतों में पानी के प्रबंधन के जरिए।

2. रणनीति में बदलाव: 'हाई-इंटीग्रिटी' क्रेडिट पर जोर

अमेज़न का यह कदम बाजार से सीधे क्रेडिट खरीदने के बजाय खुद की आपूर्ति (Supply) बनाने के लिए परियोजनाओं में निवेश करने की नई कॉर्पोरेट प्रवृत्ति को दर्शाता है।

सत्यापन: अमेज़न "वास्तविक और सत्यापन योग्य जलवायु परिणामों" पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिसके लिए सैटेलाइट मैपिंग और फील्ड मापन का उपयोग किया जाएगा।

विश्वसनीयता: 'ग्रो इंडिगो' (Grow Indigo) के उमंग अग्रवाल के अनुसार, यह सौदा संकेत देता है कि कृषि कार्बन को अब कॉर्पोरेट खरीद के उच्चतम स्तर पर गंभीरता से लिया जा रहा है।

3. भारत ही इस बदलाव का केंद्र क्यों?

विशेषज्ञों ने भारत के इस क्षेत्र में अग्रणी होने के तीन मुख्य कारण बताए हैं:

पैमाना (Scale): भारत दुनिया की सबसे बड़ी कृषि अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहाँ चावल, गेहूं और गन्ने जैसी फसलों में उत्सर्जन कम करने की अपार संभावनाएं हैं।

संस्थागत ढांचा: भारत के पास ICAR जैसे मजबूत अनुसंधान निकाय और 'ग्रो इंडिगो' जैसे बड़े एग्री-टेक खिलाड़ी हैं जो लाखों एकड़ क्षेत्र का प्रबंधन करने में सक्षम हैं।

आर्थिक प्रभाव: भारत के 82% किसान छोटे और सीमांत हैं। कार्बन क्रेडिट को केवल जलवायु उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि किसानों के लिए अतिरिक्त आय के स्रोत के रूप में देखा जा रहा है।

4. जमीनी चुनौतियां और विश्वास का संकट

तमाम संभावनाओं के बावजूद, 'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट' (CSE) और अन्य विशेषज्ञों ने कई गंभीर चिंताएं जताई हैं:

पारदर्शिता का अभाव: परियोजनाओं के कार्यान्वयन और वित्तीय व्यवहार्यता को लेकर पारदर्शिता की कमी है।

धीमी प्रक्रिया: भारत में लगभग 150 कृषि परियोजनाएं चल रही हैं, लेकिन क्रेडिट जारी करने के लिए बहुत कम पंजीकृत हैं। किसान अभी भी मिलने वाले रिटर्न का इंतजार कर रहे हैं।

सीमित लाभ: राजस्व का एक बड़ा हिस्सा डेवलपर्स, ऑडिटर्स और प्रमाणन लागत में चला जाता है, जिससे किसानों तक पहुँचने वाली राशि बहुत कम रह जाती है।

भरोसे की कमी: 2025 के एक अध्ययन के अनुसार, किसान सरकारी विभागों और विश्वविद्यालयों पर तो भरोसा करते हैं, लेकिन निजी कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को लेकर उनमें संदेह है।

5. नीतिगत ढांचा और भविष्य के सवाल

भारत सरकार ने 'कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम' (2023) और 'स्वैच्छिक कार्बन बाजार ढांचा' (2024) के माध्यम से इस क्षेत्र को औपचारिक बनाने की कोशिश की है। हालांकि, कुछ तकनीकी और रणनीतिक सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं:

स्वामित्व: कार्बन क्रेडिट का असली मालिक कौन है—किसान या प्रोजेक्ट डेवलपर?

पेरिस समझौता (Article 6): यदि भारत अपने कम लागत वाले उत्सर्जन कटौती (जैसे मीथेन कटौती) को वैश्विक खरीदारों को बेच देता है, तो अपने खुद के राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उसे भविष्य में महंगे विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।

निष्कर्ष: अमेज़न का यह सौदा एक बड़ा प्रयोग है जो यह तय करेगा कि क्या भारत अपने करोड़ों छोटे खेतों को एक विश्वसनीय और व्यापार योग्य जलवायु समाधान में बदल सकता है। यदि यह सफल होता है, तो यह मॉडल पूरे 'ग्लोबल साउथ' (Global South) के लिए एक मिसाल बन सकता है।

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