बासमती के बाजार में 'AI' की एंट्री: केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद ने किया भारत के पहले एआई-आधारित धान सर्वेक्षण का उद्घाटन

कैचलाइन: 40 लाख हेक्टेयर में होगा डिजिटल सर्वे! 5 लाख किसानों और 1.5 लाख ग्राउंड पॉइंट्स से जुटेगा बासमती का सटीक डेटा।

07 May 2026  |  86

 

नई दिल्ली: भारतीय बासमती चावल की महक अब दुनिया भर में और भी वैज्ञानिक और सटीक डेटा के साथ पहुंचेगी। केंद्रीय वाणिज्य राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने देश के पहले AI-आधारित बासमती धान सर्वेक्षण प्रोजेक्ट का आधिकारिक उद्घाटन किया है। साल 2026 से 2028 तक चलने वाला यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट न केवल उत्पादन के आंकड़ों को स्पष्ट करेगा, बल्कि भारत की निर्यात नीति को भी नई मजबूती प्रदान करेगा।

सर्वे का विशाल दायरा और लक्ष्य

यह प्रोजेक्ट अपनी तरह का सबसे बड़ा डिजिटल सर्वेक्षण है, जिसका लक्ष्य जमीनी हकीकत को आंकड़ों में बदलना है।

क्षेत्रफल: सर्वे के तहत लगभग 40 लाख हेक्टेयर जमीन को कवर किया जाएगा।

डेटा पॉइंट्स: सटीक जानकारी के लिए 1.5 लाख से ज्यादा ग्राउंड ट्रुथ पॉइंट्स (जमीनी जांच बिंदु) बनाए गए हैं।

किसान संपर्क: इस अभियान के दौरान 5 लाख से अधिक किसानों से सीधा संपर्क कर आंकड़े जुटाए जाएंगे।

आंकड़ों का अंतर बनेगा बहस का केंद्र

दिलचस्प बात यह है कि एपीडा (APEDA) की 2023 की रिपोर्ट में बासमती की खेती का दायरा करीब 21.4 लाख हेक्टेयर बताया गया था, जबकि नया सर्वे 40 लाख हेक्टेयर को कवर कर रहा है। यह बड़ा अंतर कृषि विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गया है, जिससे इस AI सर्वे की अहमियत और बढ़ गई है।

निर्यातकों के सहयोग से जुटाया फंड

इस हाई-टेक प्रोजेक्ट की फंडिंग का मॉडल भी काफी अनूठा है:

इसका खर्च बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन (BEDF) द्वारा उठाया जा रहा है।

फंड जुटाने के लिए APEDA वर्तमान में बासमती निर्यातकों से शिपमेंट के अनिवार्य पंजीकरण के समय 70 रुपये प्रति टन का शुल्क लेता है।

निर्यात और वैज्ञानिक सलाह में मिलेगी मदद

सर्वे का मुख्य उद्देश्य केवल आंकड़े जुटाना नहीं है, बल्कि:

सटीक उत्पादन आकलन: बासमती की पैदावार का सही अनुमान लगाना।

किस्मों की पहचान: बासमती की अलग-अलग किस्मों का वर्गीकरण करना।

वैज्ञानिक सलाह: किसानों को डेटा के आधार पर बेहतर खेती के गुर सिखाना।

एक्सपोर्ट प्लानिंग: वैश्विक बाजार की मांग के अनुसार बेहतर निर्यात रणनीति तैयार करना।

IREF की भागीदारी की इच्छा

इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) ने भी इस पहल का स्वागत किया है। फेडरेशन के महानिदेशक विनोद कौल ने सुझाव दिया है कि सटीक नीति निर्माण के लिए जीआई (GI) और गैर-जीआई क्षेत्रों की अलग-अलग सर्वे रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए। संगठन ने इस प्रोजेक्ट में शामिल होने की इच्छा भी जाहिर की है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एआई का यह समावेश भारतीय बासमती को अंतरराष्ट्रीय मानकों पर और अधिक विश्वसनीय बनाएगा, जिससे किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम मिल सकेगा।

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