नई दिल्ली | पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी युद्ध की लपटें अब भारतीय खेतों तक पहुँचती दिख रही हैं। गुरुवार को 'इंडियन पोटाश लिमिटेड' (IPL) द्वारा आयोजित एक हालिया टेंडर में फॉस्फेट उर्वरक (Phosphate Fertilizer) के लिए $900 प्रति टन से अधिक की बोलियाँ प्राप्त हुईं। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय तनाव किस तरह दुनिया के सबसे बड़े आयातकों में से एक, भारत के लिए लागत बढ़ा रहा है।
टेंडर में दिखी कीमतों की 'अग्निपरीक्षा'
व्यापारिक सूत्रों के अनुसार, इस टेंडर में कीमतें $930 से $1,100 प्रति टन के बीच रही हैं। हालांकि भारत को अपनी जरूरत से लगभग दोगुना (2.3 मिलियन टन) की आपूर्ति के प्रस्ताव मिले हैं, लेकिन ऊंची कीमतों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। लगभग 18 कंपनियों ने इस टेंडर में हिस्सा लिया, लेकिन बढ़ी हुई दरों ने आगामी खरीफ सीजन की तैयारियों पर सवालिया निशान लगा दिया है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज: सप्लाई चेन की कमजोर कड़ी
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि फॉस्फेट के प्रसंस्करण (Processing) के लिए आवश्यक 'सल्फर' की वैश्विक आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में किसी भी प्रकार के व्यवधान का सीधा असर सल्फर की उपलब्धता पर पड़ता है।
सल्फर की कीमतें: वर्तमान में सल्फर के दाम 2013 के बाद के उच्चतम स्तर पर हैं।
लागत में वृद्धि: ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से भारत में फॉस्फेट की आवक लागत (माल ढुलाई सहित) में 30 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ है।
क्या सरकार सह पाएगी सब्सिडी का बोझ?
ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस की वरिष्ठ विश्लेषक एलेक्सिस मैक्सवेल के अनुसार:
"चूंकि भारत सरकार फॉस्फेट पर सब्सिडी देती है, इसलिए किसानों के लिए तो यह अभी भी सस्ता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार इन आसमान छूती कीमतों का बोझ उठा पाएगी?"
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार ने अतीत में भी बढ़ी हुई लागत को खुद वहन किया है और इस साल भी ऐसा होने की उम्मीद है, ताकि किसानों पर इसका असर न पड़े।
मानसून से पहले यूरिया की भी बड़ी खरीद
सिर्फ फॉस्फेट ही नहीं, भारत ने हाल ही में 2.5 मिलियन टन यूरिया की भी खरीद की है, जिसके लिए युद्ध-पूर्व स्तरों की तुलना में लगभग दोगुनी कीमत चुकानी पड़ी है। चावल, मक्का और सोयाबीन जैसी मानसूनी फसलों की बुवाई से ठीक पहले ये खरीद बेहद महत्वपूर्ण है।
आगे की चुनौती: यदि मई के अंत तक 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' बंद रहता है, तो इसका सबसे बुरा असर जुलाई और अगस्त में दिखेगा। बता दें कि भारत अपनी साल भर की जरूरत का अधिकांश 'DAP' (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) साल की दूसरी छमाही में ही आयात करता है।
शीर्षक के अन्य विकल्प:
खाद संकट: मिडिल ईस्ट युद्ध ने बढ़ाई फॉस्फेट की कीमतें, $1100 तक पहुँचे टेंडर भाव।
महंगी हुई खेती: सब्सिडी के बावजूद सरकार के सामने चुनौती, युद्ध के चलते खाद आयात की लागत 30% बढ़ी।
मानसून से पहले टेंशन: आसमान पर पहुँचे फर्टिलाइजर के दाम, हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना वैश्विक सप्लाई में बाधा।