स्वास्थ्य पूंजी: कृषि सुधार का वह 'अनदेखा' अध्याय, जो आंकड़ों से ज्यादा इंसान को अहमियत देता है

हम फसल का बीमा तो करते हैं, पर उस 'इंजन' का क्या जो इसे उगाता है? किसान की सेहत को सामाजिक लागत नहीं, आर्थिक पूंजी मानने का समय।

09 May 2026  |  64

 

नई दिल्ली: दशकों से हमारी कृषि नीतियों ने किसान को केवल एक 'इनपुट प्रदाता' (Input Provider) के रूप में देखा है—ठीक वैसे ही जैसे यूरिया की बोरी या डीजल का लीटर। हम प्रति एकड़ उपज, मिट्टी की सेहत और ऋण प्रवाह का हिसाब तो सर्जिकल सटीकता के साथ रखते हैं, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण इंजन—किसान के शरीर और मन—की लगातार अनदेखी करते आ रहे हैं।

अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य को 'सामाजिक लागत' के बजाय 'आर्थिक पूंजी' (Economic Capital) के रूप में देखा जाए।

भोजन की 'अदृश्य' कीमत और स्वास्थ्य मूल्यह्रास

जब हम बाजार से अनाज खरीदते हैं, तो हम केवल बीज और पानी की कीमत नहीं चुका रहे होते, बल्कि एक इंसान की शारीरिक ऊर्जा का उपभोग कर रहे होते हैं। वर्तमान में वैश्विक खाद्य कीमतें कृत्रिम रूप से कम हैं क्योंकि उनमें 'हेल्थ डेप्रिसिएशन' (स्वास्थ्य मूल्यह्रास) को शामिल नहीं किया गया है।

यदि खेती की वास्तविक लागत में किसान के चिकित्सा व्यय और जीवन भर की शारीरिक क्षमता के नुकसान को जोड़ दिया जाए, तो भोजन की कीमतें 20% या उससे अधिक बढ़ सकती हैं। असल में, दुनिया आज उन लोगों के गिरते स्वास्थ्य की सब्सिडी पर सस्ता खाना खा रही है, जो हमारा पेट भरते हैं।

वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला के लिए जोखिम

अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए 'सस्टेनेबिलिटी' का मतलब अक्सर पेड़ लगाना या पानी बचाना होता है। लेकिन क्या वह आपूर्ति श्रृंखला टिकाऊ कही जा सकती है जहाँ किसान 'मेडिकल ऋण' के जाल में फंसा हो या कम उम्र में बीमारियों का शिकार हो रहा हो?

वैश्विक खाद्य प्रणाली को भविष्य के झटकों से बचाने के लिए अब 'हेल्थ कैपिटल इंडेक्स' (Health Capital Index) की आवश्यकता है। एक स्वस्थ किसान समुदाय ही 10 अरब की ओर बढ़ती वैश्विक आबादी का पेट भरने में सक्षम होगा।

नीतिगत बदलाव: जो अब अनिवार्य हैं

स्वास्थ्य-समायोजित मूल्य निर्धारण (Health-Adjusted Pricing): न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या खरीद दरें तय करते समय मानवीय श्रम और उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को उचित मूल्य दिया जाना चाहिए। शारीरिक श्रम को 'मुफ्त' या 'असीमित' संसाधन मानना बंद करना होगा।

उत्पादकता बीमा (Productivity Insurance): वर्तमान में बीमा केवल फसल का होता है। हमें ऐसे उत्पादों की जरूरत है जो किसान के स्वास्थ्य को 'प्राथमिक संपत्ति' मानें। यदि किसान बीमार है, तो फसल का विफल होना तय है।

सेफ्टी डिविडेंड (The Safety Dividend): प्राकृतिक या जैविक खेती को केवल पर्यावरण के चश्मे से नहीं, बल्कि 'निवारक स्वास्थ्य सेवा' (Preventive Healthcare) के रूप में देखा जाना चाहिए। यह जहरीले रसायनों से किसान की स्वास्थ्य पूंजी को बचाने का निवेश है।

निष्कर्ष: रीढ़ की हड्डी की देखभाल

हम एक थके हुए, बीमार और क्षीण ग्रामीण कार्यबल के दम पर उच्च विकास वाली अर्थव्यवस्था की कल्पना नहीं कर सकते। यदि हम चाहते हैं कि कृषि भविष्य की रीढ़ बनी रहे, तो हमें उस 'रीढ़' (किसान) की देखभाल शुरू करनी होगी। स्वास्थ्य पूंजी को मान्यता देना उस कृषि सुधार की ओर पहला कदम है, जो अंततः प्रतिशत से पहले लोगों (People before Percentages) को रखता है।

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