खेती के 'आकाश' पर बस्तर का 'कृषि-ऋषि': बैंक की नौकरी छोड़ खड़ी की 100 करोड़ की कृषि क्रांति

हेलीकॉप्टर के बाद अब हवाई जहाज से उड़ान भरेगा भारत का पहला 'हवाई किसान', मिट्टी से स्वर्ण उपजाने की अद्भुत दास्तां।

14 May 2026  |  72

 

बस्तर/रायपुर। हौसले अगर फौलादी हों और इरादों में नवाचार की चमक, तो बस्तर की मिट्टी भी सोना उगल सकती है। यह साबित कर दिखाया है डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने। कभी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) में प्रोबेशनर ऑफिसर की सुरक्षित कुर्सी पर बैठने वाले डॉ. त्रिपाठी ने जब कलम छोड़कर हल थामा, तो दुनिया हैरान थी। लेकिन आज 100 करोड़ रुपये के सालाना टर्नओवर और 25 लाख किसानों के प्रेरणास्रोत बनकर उन्होंने साबित कर दिया कि खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि सबसे बड़ा गौरव है।

नौकरी के 'सेफ ज़ोन' से मिट्टी की तपस्या तक

डॉ. त्रिपाठी की शैक्षणिक यात्रा किसी मेधावी छात्र का सपना हो सकती है—6 विषयों में एमए, एलएलबी, पीएचडी और बैंक में अधिकारी का पद। लेकिन व्यवस्था का हिस्सा बनने के बजाय, वे 'व्यवस्था का पोषण' करना चाहते थे। पिछले 30 वर्षों की साधना ने उनके 1200 एकड़ के फार्म को एक ऐसे 'कृषि-आश्रम' में बदल दिया है, जहाँ तकनीक और परंपरा का अद्भुत संगम मिलता है।

MDBP-16: बस्तर का 'काला सोना'

डॉ. त्रिपाठी की सबसे बड़ी उपलब्धि काली मिर्च की क्रांतिकारी किस्म MDBP-16 का विकास है। जहाँ विशेषज्ञों ने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए थे कि बस्तर की जलवायु काली मिर्च के लिए नहीं है, वहीं डॉ. त्रिपाठी ने ऐसी किस्म तैयार की जिसमें देश का सर्वाधिक 16% पाइपरिन पाया गया। आज यह 'काला सोना' 16 राज्यों के किसानों की तकदीर बदल रहा है।

"खेती धीरज का ही दूसरा नाम है। जैसे कबीर ने कहा था—'माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय'। किसान से बड़ा धैर्यवान इस दुनिया में कोई और नहीं।" — डॉ. राजाराम त्रिपाठी

हवाई जहाज वाला पहला भारतीय किसान

नवाचार के प्रति उनकी दीवानगी का आलम यह है कि खेती की निगरानी और कार्यों के लिए वे पहले ही हेलीकॉप्टर खरीदकर सुर्खियां बटोर चुके हैं। अब वे बहुत जल्द अपना निजी हवाई जहाज लेने जा रहे हैं, जिससे वे देश के पहले ऐसे किसान बन जाएंगे जो बादलों से अपनी फसलों की रखवाली करेंगे।

डॉ. त्रिपाठी के सफलता के 'बीज मंत्र':

बहुस्तरीय खेती (Multi-layer Farming): एक ही ज़मीन पर एक साथ 4-5 फसलें (जैसे पेड़, काली मिर्च और औषधीय पौधे) लेना। यह मॉडल एक एकड़ को 50-60 एकड़ की उत्पादकता के बराबर बना देता है।

नेचुरल शेड मॉडल: पॉली हाउस के खर्चीले 'सफेद हाथी' के बजाय पेड़ों के जरिए प्राकृतिक छाया और जैविक खाद का निर्माण।

मार्केटिंग फर्स्ट: उत्पादन से पहले बाजार की मांग और आपूर्ति का होमवर्क करना अनिवार्य है।

विविधता (Diversity): अपने सारे निवेश एक ही फसल में न लगाकर अल्पकालिक और दीर्घकालिक फसलों का संतुलन बनाना।

नारी शक्ति और राजनीति पर बेबाक राय

डॉ. त्रिपाठी का मानना है कि बस्तर की खेती 70% महिलाओं के कंधों पर टिकी है। वे राजनीति को सुधारने के लिए किसानों की एकजुटता को अनिवार्य मानते हैं, हालांकि स्वयं सक्रिय राजनीति से कोसों दूर रहना चाहते हैं। उनके अनुसार, जिस दिन किसान जाति और भाषा को छोड़कर एकजुट होगा, उसी दिन देश की असली कृषि नीति बनेगी।

निष्कर्ष: 'हरित-योद्धा' और 'हर्बल किंग' जैसे अलंकारों से सुसज्जित डॉ. राजाराम त्रिपाठी आज उन युवाओं के लिए एक जीवंत उदाहरण हैं जो खेती को पिछड़ा काम समझते हैं। उनकी कहानी संदेश देती है कि यदि जीत की 'ज़िद' हो, तो एक डिफ़ॉल्टर घोषित होने वाला किसान भी उसी बैंक का मुख्य अतिथि बन सकता है।

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