भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों का भारी पलायन: मई में अब तक ₹27,048 करोड़ निकाले

साल 2026 में अब तक ₹2.2 लाख करोड़ की रिकॉर्ड बिकवाली, डॉलर की मजबूती और AI की होड़ से रुपया ₹96.14 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर।

17 May 2026  |  86

 

नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक (Geopolitical) तनाव के बीच भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की भारी बिकवाली का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस महीने (मई) में अब तक विदेशी निवेशकों ने बाजार से ₹27,048 करोड़ की नकदी निकाल ली है।

इस ताजा बिकवाली के साथ साल 2026 में अब तक का कुल आउटफ्लो (पूंजी निकासी) ₹2.2 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है, जो कि साल 2025 में हुई पूरे साल की कुल बिकवाली से भी कहीं अधिक है।

2026 का रिपोर्ट कार्ड: फरवरी को छोड़कर हर महीने सिर्फ बिकवाली

नेशनल Securities डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 में विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में लगातार नेट सेलर्स (बिकवाल) बने हुए हैं:

जनवरी: ₹35,962 करोड़ की निकासी के साथ साल की निराशाजनक शुरुआत हुई।

फरवरी: इस महीने थोड़ा ट्रेंड बदला और निवेशकों ने ₹22,615 करोड़ का शुद्ध निवेश किया, जो पिछले 17 महीनों का सबसे बड़ा इनफ्लो था।

मार्च: फरवरी की राहत के बाद मार्च में बिकवाली का तगड़ा झटका लगा और रिकॉर्ड ₹1.17 लाख करोड़ के शेयर बेचे गए।

अप्रैल: बाजार में कमजोरी जारी रही और ₹60,847 करोड़ का नेट आउटफ्लो हुआ।

मई (अब तक): बिकवाली का दौर जारी है और ₹27,048 करोड़ से ज्यादा की रकम निकाली जा चुकी है।

पिछले साल (2025) का रिकॉर्ड महज 5 महीनों में टूटा

विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से यह पलायन कितना बड़ा है, इसे इस तुलनात्मक तालिका से समझा जा सकता है:

समयावधि (वर्ष)कुल आउटफ्लो (FPI बिकवाली)स्थिति / प्रभाव
पूरा साल 2025₹1.66 लाख करोड़पूरे साल की कुल निकासी
साल 2026 (केवल 5 महीने)₹2.20 लाख करोड़ से अधिकपिछले साल के मुकाबले भारी बढ़ोतरी

 

बिकवाली के मुख्य कारण: डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड की मजबूती

मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के प्रिंसिपल - मैनेजर रिसर्च, हिंमाशू श्रीवास्तव के अनुसार, वैश्विक विकास को लेकर बनी अनिश्चितता, मुख्य क्षेत्रों में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की अस्थिर कीमतों की वजह से उभरते बाजारों (जैसे भारत) के प्रति निवेशकों का सेंटिमेंट कमजोर हुआ है।

डिफेंसिव मोड में निवेशक: मजबूत अमेरिकी डॉलर और बढ़ी हुई यूएस बॉन्ड यील्ड इस बिकवाली के सबसे बड़े कारण हैं। विकसित बाजारों में बेहतर और सुरक्षित रिटर्न मिलने से निवेशक अब जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित संपत्तियों की तरफ भाग रहे हैं। इसके अलावा, वैश्विक महंगाई और केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में कटौती को लेकर असमंजस भी फंड एलोकेशन को प्रभावित कर रहा है।

चौतरफा दबाव: रुपया ₹96.14 के स्तर पर गिरा

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजिस्ट वी के विजयकुमार के मुताबिक, FPIs की लगातार बिकवाली और देश के बढ़ते करंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाता घाटा) के कारण भारतीय रुपए पर भारी दबाव देखा जा रहा है।

साल की शुरुआत में डॉलर के मुकाबले रुपया 90 के स्तर पर था, जो 15 मई को 96 के स्तर को पार करते हुए 96.14 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। अगर कच्चे तेल के दाम ऊंचे रहे, तो रुपया आगे और कमजोर हो सकता है।

नया ट्रेंड: AI कंपनियों की तरफ डायवर्ट हो रहा है ग्लोबल फंड

एक और दिलचस्प वजह सामने आ रही है—दुनिया भर में इस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर फोकस करने वाली कंपनियों में बड़े पैमाने पर वैश्विक निवेश किया जा रहा है। इस वजह से भारत जैसे देशों से फंड डायवर्ट हो रहा है, जिन्हें AI की इस रेस में फिलहाल थोड़ा पीछे माना जा रहा है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि जब AI ट्रेड का मौजूदा बबल (बुलबुला) शांत होगा, तब यह ट्रेंड वापस भारत के पक्ष में बदल सकता है।

आसान भाषा में समझें: FPI और बॉन्ड यील्ड क्या हैं?

फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI): जब किसी विदेशी देश के नागरिक या कंपनियां भारत के शेयर बाजार, बॉन्ड या म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो उसे FPI कहा जाता है। इन्हें 'शॉर्ट-टर्म इन्वेस्टर' या 'हॉट मनी' भी माना जाता है, जो बाजार के हालातों को देखकर बहुत तेजी से पैसा निकालते या निवेश करते हैं।

बॉन्ड यील्ड (Bond Yield): सरकारी बॉन्ड में निवेश करने पर मिलने वाले रिटर्न या ब्याज को बॉन्ड यील्ड कहते हैं। जब अमेरिका जैसे विकसित देशों में सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़ती है, तो विदेशी निवेशक भारत जैसे विकासशील देशों के शेयर बाजार (जोखिम वाले बाजार) से पैसा निकालकर अपने देश के सुरक्षित सरकारी बॉन्ड में लगाने लगते हैं।

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