नई दिल्ली। भारत के दूरदराज और नेटवर्क विहीन क्षेत्रों में रहने वाले मोबाइल यूजर्स के लिए एक बड़ी और राहत भरी तकनीक पर काम चल रहा है। देश में 'डायरेक्ट-टू-डिवाइस' (D2D) सैटेलाइट कनेक्टिविटी को लागू करने पर तेजी से चर्चा जारी है। इस तकनीक के आने के बाद स्मार्टफोन बिना किसी मोबाइल नेटवर्क (टेलीकॉम टावर) के सीधे सैटेलाइट से कनेक्ट हो सकेंगे।
इस बीच, टेक जगत की दिग्गज कंपनियों Apple और Google ने भारत सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) से इस बात पर स्पष्टता मांगी है कि भारतीय नियमों के तहत इन सेवाओं का संचालन कैसे किया जाएगा।
क्या है डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) टेक्नोलॉजी?
डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) एक ऐसी उन्नत तकनीक है जो सामान्य मोबाइल फोन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) सेंसर और वाहनों को बिना किसी अतिरिक्त या विशेष हार्डवेयर के पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद लो-अर्थ-ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट से सीधे जुड़ने की अनुमति देती है। वर्तमान में दुनिया के कई प्रीमियम स्मार्टफोन में यह सुविधा मुख्य रूप से 'इमरजेंसी SOS' फीचर के तौर पर मिल रही है।
भारत के लिए क्यों गेमचेंजर है यह तकनीक?
भारत में भौगोलिक विविधताओं के कारण यह तकनीक बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है:
दुर्गम क्षेत्रों में कनेक्टिविटी: पहाड़ी राज्यों, घने जंगलों, आपदा प्रभावित क्षेत्रों और सीमावर्ती जिलों में जहां मोबाइल टावर लगाना बेहद कठिन या आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है, वहां यह तकनीक नेटवर्क पहुंचाएगी।
आपातकालीन स्थिति में मददगार: मोबाइल कवरेज न होने की स्थिति में भी लोग सैटेलाइट मैसेजिंग के जरिए आपातकालीन कॉल कर सकेंगे, अपनी लाइव लोकेशन साझा कर सकेंगे और जरूरी संदेश भेज सकेंगे।
टेक कंपनियों के सामने हैं ये 4 बड़ी चुनौतियां
इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, Apple, Google और अन्य हितधारकों (Stakeholders) ने दूरसंचार विभाग और रेगुलेटर के सामने इस तकनीक को लेकर कुछ तकनीकी और इंजीनियरिंग चिंताएं जाहिर की हैं:
| चुनौती | विवरण |
|---|---|
| बैटरी की भारी खपत | पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क की तुलना में सैकड़ों किलोमीटर ऊपर स्थित LEO सैटेलाइट से सीधे जुड़ने के लिए स्मार्टफोन को बहुत अधिक पावर (ऊर्जा) की जरूरत होती है, जिससे बैटरी तेजी से खत्म हो सकती है। |
| एंटीना की सीमाएं | आधुनिक स्मार्टफोन को स्लिम और कॉम्पैक्ट बनाया जाता है। ऐसे में सैटेलाइट से मजबूत संपर्क बनाए रखने वाले हार्डवेयर के लिए फोन के अंदर बहुत कम जगह बचती है। |
| नेटवर्क इंटीग्रेशन | यूजर्स के अनुभव को प्रभावित किए बिना, मौजूदा 4G और 5G सेल्युलर नेटवर्क के साथ सैटेलाइट संचार को सुचारू रूप से जोड़ना (इंटीग्रेट करना) एक जटिल काम है। |
| हार्डवेयर री-डिजाइनिंग का डर | कंपनियां इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यदि भारत ने अपने स्तर पर कोई विशेष नियम या दायित्व थोपे, तो निर्माताओं को वैश्विक मानक (Global Standards) के आधार पर बने अपने सैटेलाइट फीचर्स और हार्डवेयर को भारत के लिए फिर से री-डिजाइन करना पड़ सकता है। |
Apple की सरकार को सलाह: नियमों में न हो कड़ाई
रिपोर्ट के मुताबिक, Apple ने दूरसंचार विभाग (DoT) को सुझाव दिया है कि वह स्मार्टफोन में सैटेलाइट कनेक्टिविटी को सक्षम करने के लिए किसी भी तरह के हार्डवेयर संशोधन (Modification) या नए सिरे से री-सर्टिफिकेशन की शर्तों को अनिवार्य न करे। चूंकि पृथ्वी से सैकड़ों किलोमीटर ऊपर तैर रहे उपग्रहों से फोन के छोटे से एंटीना को सिंक करना बेहद जटिल इंजीनियरिंग का हिस्सा है, इसलिए वैश्विक मानकों के साथ छेड़छाड़ तकनीक के विस्तार को धीमा कर सकती है।