मुंबई: देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 4 रुपये प्रति लीटर के इजाफे के बाद आम जनता के बजट पर असर पड़ना तय माना जा रहा है। इस बीच, देश की अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को लेकर देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की ताजा ‘इकोरैप’ (Ecowrap) रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के आंकड़े राहत और चिंता दोनों का मिलाजुला संदेश दे रहे हैं। एसबीआई के मुताबिक, इस बढ़ोतरी से आम आदमी की जेब पर तात्कालिक बोझ तो बढ़ेगा और महंगाई में मामूली उछाल आएगा, लेकिन देश की राजकोषीय स्थिति (Fiscal Health) पर इसका कोई सीधा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
क्यों बढ़ानी पड़ीं कीमतें? तेल कंपनियों को रोजाना 1,000 करोड़ का नुकसान
रिपोर्ट में इस बढ़ोतरी के पीछे के मुख्य आर्थिक कारण का खुलासा किया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार और मौजूदा परिस्थितियों के कारण तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा था।
रोजाना का घाटा: तेल कंपनियां प्रति दिन लगभग 1,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठा रही थीं।
वित्तीय स्थिरता: कीमतों में इस 4 रुपये की बढ़ोतरी का मुख्य उद्देश्य तेल कंपनियों के इसी रोजाना के वित्तीय घाटे (अंडर-रिकवरी) को कम करना और उन्हें बड़ी राहत देना है, ताकि देश का ऊर्जा ढांचा मजबूत बना रहे।
महंगाई का मीटर: मई-जून में दिखेगा असर
एसबीआई की रिपोर्ट यह साफ करती है कि ईंधन के दाम बढ़ने से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित खुदरा महंगाई दर में तुरंत कुछ तेजी देखने को मिलेगी:
0.20% तक का उछाल: मई-जून 2026 के दौरान देश की खुदरा महंगाई दर में 0.15 से 0.20 प्रतिशत (15-20 बेसिस पॉइंट्स) की वृद्धि होने की आशंका है।
FY27 का नया अनुमान: इस तात्कालिक उछाल के कारण वित्तीय वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए सालाना महंगाई दर का अनुमान अब संशोधित कर 4.7% कर दिया गया है।
खपत का चक्र: रिपोर्ट में एक बेहद दिलचस्प मानवीय व्यवहार (Consumer Behavior) का भी जिक्र है। तेल के दाम बढ़ते ही शुरुआत में लोग कुछ समय के लिए वाहनों का इस्तेमाल या ईंधन की खपत कम कर देते हैं। लेकिन कुछ ही हफ्तों बाद यह खपत दोबारा सामान्य स्तर पर आ जाती है। यही कारण है कि सालाना आधार पर पेट्रोल-डीजल की कुल बिक्री में कोई खास गिरावट दर्ज नहीं होती है।
राजकोषीय सेहत पर क्यों नहीं होगा असर?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चूंकि यह मूल्य वृद्धि सीधे तौर पर तेल कंपनियों के घाटे को पाटने के लिए की गई है, न कि सरकार द्वारा किसी नए टैक्स या सब्सिडी में बदलाव के रूप में, इसलिए सरकार के बजटीय घाटे (Fiscal Deficit) या देश के राजकोष पर इसका कोई सीधा वित्तीय दबाव नहीं आएगा। यह कदम देश की व्यापक आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने के लिए एक 'कड़वी दवा' की तरह काम करेगा।