ऐतिहासिक निचले स्तर पर गिरा भारतीय रुपया: डॉलर के मुकाबले 96.47 के 'लाइफ टाइम लो' पर बंद, देश के चालू खाता घाटे और महंगाई पर बड़ा खतरा

डॉलर के सामने पस्त हुआ रुपया: कच्चे तेल की आग और FIIs की बिकवाली ने बढ़ाई देश की आर्थिक चिंता, समझें इसके मायने।

19 May 2026  |  74

 

 

मुंबई/नई दिल्ली: वैश्विक मोर्चे पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों का सीधा असर अब भारतीय मुद्रा पर दिखने लगा है। लगातार बढ़ रहे तेल के दबाव (Unrelenting Oil Pressure) और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कमजोर रिस्क सेंटीमेंट के कारण मंगलवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.47 के अब तक के सबसे निचले रिकॉर्ड स्तर पर बंद हुआ।

सोमवार को रुपया 96.3875 के स्तर पर था, लेकिन मंगलवार को कारोबारी सत्र के दौरान इसने गिरावट का नया रिकॉर्ड बना दिया। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी के आखिर में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक भारतीय करेंसी (रुपया) को कुल 6% का भारी नुकसान हो चुका है।

क्यों टूट रहा है रुपया? ये हैं 3 सबसे बड़े कारण

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, रुपए की इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे तीन मुख्य कारक काम कर रहे हैं:

कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें: यू.एस. और ईरान के बीच जारी युद्ध व गतिरोध के कारण पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे तेल बेहद महंगा हो गया है। भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक तेल आयात करता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है।

विदेशी निवेशकों (FIIs) का पलायन: भारतीय शेयर बाजारों से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा लगातार पैसे की निकासी (बिकवाली) की जा रही है, जिससे घरेलू बाजार से डॉलर बाहर जा रहा है।

यू.एस. बॉन्ड यील्ड में उछाल: अमेरिका में 10-साल की ट्रेजरी यील्ड एक साल के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। इसके कारण निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका में सुरक्षित निवेश कर रहे हैं, जिससे फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने की संभावना और प्रबल हो गई है।

चालू खाता घाटा (CAD) और भुगतान संतुलन (BOP) पर गहराया संकट

वैश्विक वित्तीय संस्था HSBC द्वारा जारी एक नोट के अनुसार, भारत इस समय दोहरी चुनौती से जूझ रहा है—पहला, चालू खाता घाटे को कम करना और दूसरा, बाजार में टिकाऊ विदेशी पूंजी को आकर्षित करना।

बढ़ता व्यापार घाटा: कच्चे तेल के आयात में भारी बढ़ोतरी के कारण अप्रैल महीने में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 28.38 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले छह महीनों का उच्चतम स्तर है।

BOP में रिकॉर्ड घाटे का अनुमान: विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस साल भारत का भुगतान संतुलन (Balance of Payments) बढ़कर 65 से 70 अरब डॉलर के घाटे के दायरे में पहुंच सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह लगातार तीसरा साल होगा जब देश को भुगतान संतुलन में घाटा उठाना पड़ेगा।

रेमिटेंस पर असर: मध्य-पूर्व (Middle East) में जारी युद्ध के कारण विदेशों से आने वाले धन (Remittance) पर भी नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है।

आम जनता पर क्या होगा असर? थोक महंगाई साढ़े तीन साल के टॉप पर

रुपए के कमजोर होने और ऊर्जा (क्रूड ऑयल) की लागत बढ़ने का सीधा असर देश की घरेलू अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ने लगा है।

थोक महंगाई में उछाल: ऊर्जा संकट के कारण अप्रैल महीने में देश की थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर पिछले साढ़े तीन साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच चुकी है। रुपया कमजोर होने से आयात होने वाली तमाम चीजें (इलेक्ट्रॉनिक्स, कच्चा माल, दवाइयां) महंगी हो जाएंगी, जिससे खुदरा महंगाई भी बढ़ने की पूरी आशंका है।

अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे इसी गंभीर दबाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से ईंधन (फ्यूल) और विदेशी मुद्रा बचाने की विशेष अपील की है। जानकारों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द शांत नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को रुपए को संभालने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) का एक बड़ा हिस्सा बाजार में झोंकना पड़ सकता है।

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