बासमती चावल के लिए अलग बोर्ड की तैयारी: किसानों की घटती आय और निर्यात चुनौतियों से निपटने के लिए उठ रही मांग

APEDA से अलग स्वायत्त निकाय बनाने के लिए निर्यातकों और किसान संगठनों ने प्रधानमंत्री से लगाई गुहार; सालाना ₹45.5 करोड़ के फंड के सही इस्तेमाल पर जोर।

19 May 2026  |  63

 

नई दिल्ली। भारत के प्रसिद्ध बासमती चावल क्षेत्र की चमक को बरकरार रखने और इससे जुड़े लाखों किसानों की तकदीर बदलने के लिए एक समर्पित 'बासमती चावल बोर्ड' (Basmati Rice Board) की स्थापना पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। गिरती कृषि आय, बढ़ती लागत और वैश्विक निर्यात में मिल रही कड़ी प्रतिस्पर्धा से निपटने के लिए उद्योग जगत और किसान संगठनों ने अब एक संस्थागत सुधार की मांग तेज कर दी है।

हाल ही में भारतीय किसान संघ (BKS) द्वारा आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में निर्यातकों, मिलर्स और कृषि विशेषज्ञों ने इस बात पर पूर्ण सहमति जताई कि बासमती के लिए एक विशेष बोर्ड का होना समय की मांग है।

क्यों महसूस हो रही है अलग बोर्ड की जरूरत?

वर्तमान में बासमती चावल का पूरा कामकाज कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के अंतर्गत आता है। हालांकि, हितधारकों (Stakeholders) का मानना है कि APEDA का दायरा बहुत बड़ा है, जिसके कारण बासमती के हितों पर उतना ध्यान नहीं मिल पाता जितने की जरूरत है।

अखिल भारतीय चावल निर्यातक संघ (AIREA) और पंजाब राइस मिलर्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (PRMEA) ने संयुक्त रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर चाय, कॉफी और मसाला बोर्ड की तर्ज पर वाणिज्य मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त वैधानिक निकाय (Autonomous Statutory Body) बनाने का आग्रह किया है।

चुनौतियों के चक्रव्यूह में फंसा 'बासमती'

इस ऐतिहासिक सुगंधित चावल के सामने इस समय कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं:

घटता प्रीमियम और बढ़ती लागत: हाल के सीजन में बासमती धान की औसत कीमतें ₹2,500 से ₹3,700 प्रति क्विंटल के बीच रही हैं, जो किसानों की ₹4,000 से अधिक की उम्मीदों से काफी कम हैं। पिछले एक दशक में उर्वरकों, ईंधन और श्रम की लागत दो से तीन गुना बढ़ गई है, जिससे बासमती की खेती का मुनाफा अब सामान्य धान जैसा ही रह गया है।

बीज की शुद्धता और गुणवत्ता का संकट: किसानों को सार्वजनिक और निजी स्रोतों से मिलने वाले बीजों की प्रामाणिकता पर संदेह रहता है। मिलावटी बीजों के कारण फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय मानकों पर चावल खरा नहीं उतर पाता।

फंड के सही इस्तेमाल पर सवाल: निर्यातकों से मिलने वाले पंजीकरण शुल्क (RCAC) से सालाना करीब ₹45.5 करोड़ का फंड जुटता है, जिसका आधा हिस्सा APEDA रख लेता है। उद्योग जगत का आरोप है कि करीब ₹80 करोड़ के बजट के बावजूद बासमती के लिए जमीनी स्तर पर बेहद सीमित अधिकारी और संसाधन तैनात हैं।

अलग बोर्ड बनने से क्या होगा बदलाव?

"एक समर्पित बोर्ड के माध्यम से फंड का सही और सीधा इस्तेमाल हितधारकों के हित में किया जा सकेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय विपणन (International Marketing), बीज प्रमाणन, किसान प्रशिक्षण और वैश्विक नियमों के अनुपालन में मदद मिलेगी।" — उद्योग विशेषज्ञ

विशेषज्ञों का मानना है कि अलग बोर्ड बनने से भारत अपनी भौगोलिक संकेतक (GI) स्थिति को और मजबूत कर सकेगा और अंतरराष्ट्रीय बाजारों (जैसे मध्य पूर्व, यूरोप और उत्तरी अमेरिका) में अपने $4 बिलियन (4 अरब डॉलर) से अधिक के बासमती ब्रांड का नेतृत्व बनाए रख सकेगा।

आगे की राह

किसानों और व्यापारिक संगठनों के इस साझा प्रस्ताव को अब औपचारिक रूप से वाणिज्य मंत्रालय के समक्ष विचार के लिए भेजा जा रहा है। हितधारकों ने इस संबंध में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से भी तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है, क्योंकि इस फैसले पर देश के लाखों किसानों की समृद्धि और वैश्विक बाजार में भारत की साख टिकी हुई है।

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