नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम: विपक्षी 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के भीतर सुलग रही असंतोष की चिंगारी अब खुलकर धधकने लगी है। केरल में नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस द्वारा अपने ही सहयोगी दलों को आमंत्रित न करना इस बात का सीधा प्रमाण है। जहाँ एक तरफ पश्चिम बंगाल में बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण में तमाम सहयोगी दलों की एकजुटता दिखी, वहीं केरल में कांग्रेस की जीत के बाद सहयोगियों को न्योता तक न भेजना गठबंधन के भविष्य पर बड़े सवालिया निशान खड़े करता है।
कहा जा रहा है कि कांग्रेस अब "कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पर..." की तर्ज पर चलने वाले इस गठबंधन में एकतरफा समझौता करने के मूड में नहीं है। आइए समझते हैं इस कड़वाहट के पीछे की पूरी 'इनसाइड स्टोरी'।
कांग्रेस की बड़ी शिकायत: "साथ रहकर भी पीठ में छुरा?"
कांग्रेस नेतृत्व के भीतर इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि क्षेत्रीय दल केवल अपने गृह राज्यों में सियासी फायदे के लिए कांग्रेस का हाथ थामते हैं, लेकिन दूसरे राज्यों में जाते ही वे कांग्रेस को कमजोर करने या उसका वोट काटने से बाज नहीं आते। कांग्रेस का तर्क है कि यदि क्षेत्रीय दल खुले तौर पर उसका समर्थन नहीं कर सकते, तो कम से कम उन्हें तटस्थ (Neutral) रहना चाहिए या सिर्फ 'धर्मनिरपेक्ष ताकतों' को जिताने की अपील करनी चाहिए, लेकिन जमीन पर ऐसा नहीं हो रहा।
गठबंधन की 'दरारों' का राज्यवार रिपोर्ट कार्ड
| राज्य/घटना | क्षेत्रीय दलों का रुख | कांग्रेस की नाराजगी की वजह |
|---|---|---|
| पश्चिम बंगाल | ममता बनर्जी ने कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें ऑफर कीं। अखिलेश और तेजस्वी ने खुलकर ममता का साथ दिया। | हार के बाद अब ममता 'इंडिया ब्लॉक' को मजबूत करने की बात कर रही हैं, लेकिन चुनाव में कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया गया। |
| असम व झारखंड | झारखंड में JMM और कांग्रेस मिलकर सरकार चला रहे हैं। | JMM ने असम में कांग्रेस के खिलाफ ही अपने उम्मीदवार उतार दिए। |
| दिल्ली व पंजाब | अरविंद केजरीवाल की 'आप' और कांग्रेस में दूरियां बढ़ीं। | केजरीवाल से कांग्रेस की सीधी लड़ाई के बावजूद अखिलेश, तेजस्वी, ममता, शरद पवार और स्टालिन उनके समर्थन में खड़े दिखे। |
| तमिलनाडु | DMK और कांग्रेस के बीच चुनावी दूरियां दिखीं। | डीएमके प्रमुख स्टालिन ने केजरीवाल के साथ प्रचार किया, जिससे अंततः चुनाव बाद DMK-कांग्रेस का गठबंधन ही टूट गया। |
लेफ्ट के साथ उलझा सियासी गणित
कांग्रेस के इस कड़े रुख के पीछे वामपंथियों (Left) के साथ उसके रिश्ते भी हैं। बंगाल और केरल में एक साथ चुनाव होने के कारण कांग्रेस ने लेफ्ट के गठबंधन प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। कांग्रेस का मानना था कि बंगाल में लेफ्ट के साथ जाने से केरल में वामपंथियों के खिलाफ लड़ने का सियासी संदेश गलत जाएगा।
अकेले कांग्रेस के कंधे पर नहीं है गठबंधन का बोझ
केरल के शपथ ग्रहण से सहयोगियों को दूर रखकर कांग्रेस ने साफ संदेश दे दिया है कि गठबंधन को बचाए रखने की जिम्मेदारी अकेले उसकी नहीं है। जब क्षेत्रीय दल अन्य राज्यों में कांग्रेस की सियासी जमीन खिसकाने में लगे हैं, तो कांग्रेस भी अब 'जैसे को तैसा' की रणनीति अपना रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल से शुरू हुई यह दूरी आने वाले समय में संसद की सियासत में और भी ज्यादा कड़वाहट घोल सकती है।