रिकॉर्ड निर्यात के बाद भी संकट में भारतीय चाय उद्योग: गिरती कीमतें, मौसम की मार और नेपाल से आयात ने बढ़ाई चिंता

वर्ष 2025 में ₹8,488 करोड़ के रिकॉर्ड एक्सपोर्ट के बावजूद कर्ज और घाटे के मुहाने पर खड़े हैं बागान मालिक; ITA ने सरकार से की 'न्यूनतम टिकाऊ मूल्य' तय करने की मांग।

21 May 2026  |  65

 

आर्थिक और व्यापारिक डेस्क: भारत का चाय उद्योग, जो देश के कृषि-व्यवसाय (Agri-business) की रीढ़ माना जाता है, इस समय एक बड़े नीतिगत और आर्थिक संकट से गुजर रहा है। भारतीय चाय संघ (ITA) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, भले ही भारत ने वर्ष 2025 में रिकॉर्ड तोड़ चाय निर्यात कर दुनिया के तीसरे सबसे बड़े निर्यातक के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। गिरती कीमतें, बढ़ती लागत, मौसम का बदलता मिजाज और पड़ोसी देशों से बढ़ता आयात भारतीय चाय बागानों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं।

रिकॉर्ड निर्यात के पीछे छिपा बड़ा घाटा

वर्ष 2025 में भारत ने रिकॉर्ड 280.4 मिलियन किलोग्राम चाय का निर्यात किया, जिससे देश को ₹8,488.43 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ। भारत वैश्विक चाय उत्पादन का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) योगदान करता है। लेकिन इस चमकदार हेडलाइन के पीछे एक गहरा दर्द छिपा है। चाय बागानों की नीलामी (Auction) में मिलने वाली कीमतें लागत के मुकाबले लगातार घट रही हैं, जिससे उत्पादकों का मुनाफा पूरी तरह खत्म हो चुका है।

संकट के 4 मुख्य कारण: जिसने तोड़ी चाय उद्योग की कमर

1. गिरती कीमतें और बढ़ती लागत

ITA के आंकड़ों के मुताबिक, देश में चाय की औसत नीलामी कीमत में 7.13 प्रतिशत की गिरावट आई है। साल 2024 में जो चाय ₹201.28 प्रति किलोग्राम बिक रही थी, वह 2025 में घटकर ₹186.92 प्रति किलोग्राम पर आ गई। उत्तर भारतीय बागानों को तो 10% तक का नुकसान उठाना पड़ा है। दूसरी ओर, ईंधन, ऊर्जा और उर्वरकों (Fertilisers) की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे चाय उत्पादन का खर्च लगातार बढ़ रहा है।

2. असम में सूखा और मौसम की मार

साल 2026 की शुरुआत भारतीय चाय के लिए बेहद खराब रही है। देश के सबसे बड़े चाय उत्पादक राज्य असम में जनवरी और फरवरी के महीनों में 97 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। इस भयंकर सूखे ने चाय की झाड़ियों को नुकसान पहुंचाया, जिसके कारण साल 2026 की पहली तिमाही (जनवरी-मार्च) में देश का कुल चाय उत्पादन 11.22% गिरकर केवल 98.01 मिलियन किलोग्राम रह गया।

3. नेपाल से आयात का बढ़ता दबाव

घरेलू बाजार में नेपाल से आने वाली सस्ती चाय ने भारतीय उत्पादकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। साल 2025 में नेपाल से 11.7 मिलियन किलोग्राम चाय का आयात किया गया, जो भारत की सबसे प्रीमियम 'दार्जिलिंग चाय' के कुल उत्पादन से भी ज्यादा है।

4. 'दार्जिलिंग टी' का वजूद खतरे में

अपनी अनूठी खुशबू के लिए दुनिया भर में मशहूर दार्जिलिंग चाय का उत्पादन साल 2008 (11.58 मिलियन किलोग्राम) की तुलना में 2025 में घटकर आधा यानी सिर्फ 5.3 मिलियन किलोग्राम रह गया है। 2018 से 2024 के बीच दार्जिलिंग चाय की कीमतों में 2% की नकारात्मक वृद्धि (Negative CAGR) दर्ज की गई है।

संकट से उबरने के लिए ITA की सरकार से बड़ी मांगें:

'अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस' से ठीक पहले भारतीय चाय संघ (ITA) ने नीति निर्माताओं और केंद्र सरकार से तुरंत हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है:

न्यूनतम टिकाऊ मूल्य (MSP की तर्ज पर): चाय के लिए उत्पादन लागत से जुड़ा एक न्यूनतम मूल्य तय हो, ताकि बाजार के उतार-चढ़ाव से उत्पादकों को बचाया जा सके।

निर्यात प्रोत्साहन में सुधार: सरकार 'RoDTEP' (निर्यात उत्पादों पर शुल्कों की छूट) की दरों की समीक्षा करे और दार्जिलिंग जैसी पारंपरिक (Orthodox) चाय किस्मों के लिए विशेष प्रोत्साहन बहाल करे।

दार्जिलिंग के लिए विशेष पैकेज: दार्जिलिंग के संकटग्रस्त चाय बागानों के लिए वर्किंग कैपिटल पर ब्याज सबवेन्शन (छूट) के साथ एक समर्पित राहत पैकेज जारी किया जाए।

आगे की राह:

चाय क्षेत्र की यह स्थिति साबित करती है कि कृषि क्षेत्र में केवल निर्यात आधारित विकास ही पर्याप्त नहीं है। अगर भारत को वैश्विक बाजार में अपनी बादशाहत कायम रखनी है, तो सरकार को जल्द ही कीमतों को स्थिर करने और प्राथमिक उत्पादकों (बागान श्रमिकों और मालिकों) को सुरक्षा देने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे, वरना लाखों लोगों की आजीविका पर संकट और गहरा जाएगा।

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