FAI की बड़ी अपील: 20% बायो-फर्टिलाइजर अपनाने से 40% तक घट सकता है खेती का प्रदूषण, मिट्टी की सेहत सुधरेगी

बढ़ते आयात और पर्यावरण संकट के बीच जैविक खादों पर बढ़ा केंद्र का फोकस; फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने पेश किया 'थ्री-प्रॉन्गड रोडमैप'।

21 May 2026  |  67

 

 

कृषि और पर्यावरण डेस्क: भारतीय कृषि और फर्टिलाइजर (खाद) उद्योग इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। विदेशी खनिज खादों पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण को बचाने के लिए टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने का दबाव बढ़ता जा रहा है। इसी कड़ी में, फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) ने देश में बायो-फर्टिलाइजर्स (जैव-उर्वरकों) को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने की पुरजोर वकालत की है। FAI का मानना है कि यह कदम न सिर्फ भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि हमारे अंतरराष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में भी मील का पत्थर साबित होगा।

20% जैव-उर्वरक से 40% कम होगा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन

भारत वर्तमान में दुनिया में खनिज (रासायनिक) खादों के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है। पोर्ट ब्लेयर में आयोजित एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में FAI के महानिदेशक सुरेश कुमार चौधरी ने जैव-उर्वरकों की असीम संभावनाओं को रेखांकित किया।

सुरेश कुमार चौधरी (महानिदेशक, FAI) के अनुसार: "अगर भारत अपनी फसलों की पोषण संबंधी जरूरतों का मात्र 20 प्रतिशत हिस्सा भी बायो-फर्टिलाइजर्स से पूरा करने का लक्ष्य बना ले, तो इससे खेती की जमीनों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 40 प्रतिशत तक की भारी कमी लाई जा सकती है।"

60 साल की रिसर्च का निचोड़: संतुलित पोषण ही एकमात्र रास्ता

FAI ने पिछले छह दशकों के शोध और खेतों में किए गए प्रयोगों का हवाला देते हुए साफ किया है कि मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए 'इंटीग्रेटेड न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट' (एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन) ही एकमात्र वैज्ञानिक तरीका है।

केवल रासायनिक खाद खतरनाक: खेतों के अनुभव बताते हैं कि सिर्फ और सिर्फ खनिज या रासायनिक खादों पर निर्भर रहने से मिट्टी की सेहत खराब हो रही है।

संतुलित फॉर्मूला: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के आंकड़े भी पुष्टि करते हैं कि रासायनिक खादों के साथ बायो-फर्टिलाइजर और जैविक इनपुट्स का संतुलित मिश्रण ही बेहतर पैदावार और सुरक्षित पर्यावरण की गारंटी है।

बायो-फर्टिलाइजर अपनाने के लिए FAI का 'थ्री-प्रॉन्गड रोडमैप'

महानिदेशक चौधरी ने इस बदलाव को जमीन पर उतारने के लिए उद्योग जगत और नीति निर्माताओं के सामने तीन महत्वपूर्ण रणनीतियां (Three-pronged roadmap) रखी हैं:

उत्पादन क्षमता में वृद्धि (Scale up Production): बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए प्राइवेट सेक्टर और सहकारी समितियों (Cooperatives) के निवेश को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि आपूर्ति में कमी न आए।

सख्त क्वालिटी कंट्रोल (Quality Control): मैन्युफैक्चरिंग से लेकर किसान के खेत तक खाद पहुंचने की पूरी वैल्यू चेन में गुणवत्ता से कोई समझौता न हो।

क्षेत्र-विशिष्ट फॉर्मूलेशन (Location-Specific Innovation): चूंकि रासायनिक खादों के विपरीत बायो-फर्टिलाइजर का असर अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी और मौसम पर निर्भर करता है, इसलिए स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के हिसाब से माइक्रोबियल फॉर्मूलेशन (जीवाणु आधारित खाद) विकसित किए जाएं।

ब्राजील और चीन के मॉडल पर नजर, घटेगा सब्सिडी का बोझ

रासायनिक खादों के प्रभाव को तो आसानी से मापा जा सकता है, लेकिन बायो-फर्टिलाइजर स्थानीय मिट्टी और जलवायु के साथ मिलकर एक जटिल प्रक्रिया के तहत काम करते हैं। इसके लिए किसानों को जागरूक करना और निरंतर शोध करना जरूरी है।

वैश्विक स्तर पर ब्राजील और चीन जैसे देशों ने यह साबित कर दिखाया है कि पारंपरिक खादों के साथ बायो-फर्टिलाइजर का तालमेल बिठाकर आयात पर निर्भरता को कम किया जा सकता है। भारतीय नीति निर्माता भी अब इसी तर्ज पर काम कर रहे हैं, जिससे सरकार पर हर साल पड़ने वाले भारी-भरकम 'फर्टिलाइजर सब्सिडी' के वित्तीय बोझ को कम किया जा सके।

निष्कर्ष: पेरिस जलवायु समझौते के तहत भारत अपने उत्सर्जन को घटाने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे में बायो-फर्टिलाइजर रणनीति देश की हरित कृषि क्रांति का मुख्य आधार बन सकती है। सरकारी प्रोत्साहन, स्पष्ट नियमों और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के जरिए इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ा जा सकता है।

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