जर्नलिज्म बनाम टेक जायंट्स: गूगल के नए AI सर्च फीचर्स से न्यूज पब्लिशर्स संकट में, भारत में कानूनी बहस तेज

'कंटेंट डिस्कवरी नहीं, यह कंटेंट रिप्लेसमेंट है'—AI समरी से ट्रैफिक और कमाई घटने की आशंका, स्वतंत्र पत्रकारिता के भविष्य पर खतरा।

23 May 2026  |  70

 

 

नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की तेजी से बढ़ती ताकत अब दुनिया भर की न्यूज इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा वजूद का खतरा बनती जा रही है। गूगल समेत कई बड़ी टेक कंपनियाँ अब ऐसे AI-संचालित सर्च टूल्स ला रही हैं, जो सीधे यूजर को पूरी खबर का निचोड़ (AI Summary) दे देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि जर्नलिज्म के भविष्य की लड़ाई बन चुकी है। भारत में भी अब इस मुद्दे पर कॉपीराइट उल्लंघन और राजस्व हिस्सेदारी (Revenue Sharing) को लेकर कानूनी बहस बेहद तेज हो गई है।

 AI समरी कैसे बन रही है न्यूज इंडस्ट्री के लिए 'साइलेंट किलर'?

टाइम्सनाउन्यूज डॉट कॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार, गूगल और अन्य टेक कंपनियों के नए एआई टूल्स न्यूज आर्टिकल्स, ब्लॉग्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स को स्कैन करके सीधे यूजर के स्क्रीन पर जवाब पेश कर रहे हैं। इससे यूजर्स को असली न्यूज वेबसाइट्स पर क्लिक करने की जरूरत ही खत्म होती जा रही है।

"पब्लिशर्स का यह तर्क बिल्कुल सही है कि एआई समरी अब 'कंटेंट डिस्कवरी' (कंटेंट ढूंढना) नहीं, बल्कि 'कंटेंट रिप्लेसमेंट' (कंटेंट की जगह लेना) का काम कर रही है। भारतीय कॉपीराइट एक्ट के तहत किसी भी कंटेंट को दोबारा पेश करने और जनता तक पहुंचाने का अधिकार केवल उसके मूल मालिक के पास है। यदि AI खबर की मुख्य जानकारी सीधे दे देता है, तो यह मूल ग्राउंड रिपोर्टिंग की आर्थिक वैल्यू को पूरी तरह खत्म कर देगा।" — श्वेता बंसल, टेक लॉयर और AI गवर्नेंस एक्सपर्ट

 भारतीय कानून की सीमाएं और सरकार का रुख

भारत के मौजूदा कानूनों में जनरेटिव एआई (Generative AI) और जर्नलिस्टिक कंटेंट को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट या अलग नियम मौजूद नहीं हैं। हालांकि, सरकार इस मामले को लेकर गंभीर है:

इंटरमीडियरी (मध्यस्थ) का दर्जा संकट में: आईटी एक्ट का सेक्शन 79 डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को कुछ सुरक्षा देता है, लेकिन जब कोई एआई खुद से नया जवाब (कंटेंट) तैयार करता है, तो उसे सिर्फ एक मध्यस्थ कहना मुश्किल हो जाता है।

राजस्व हिस्सेदारी की मांग: केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव भी स्पष्ट कर चुके हैं कि सोशल मीडिया और बड़ी टेक कंपनियों को असली कंटेंट बनाने वालों (पब्लिशर्स) के साथ उचित राजस्व साझेदारी करनी चाहिए।

वैश्विक मंच पर चिंता: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जिम्मेदार, सुरक्षित और मानव-केंद्रित एआई गवर्नेंस (Human-centric AI Governance) की वकालत कर चुके हैं।

 वैश्विक स्तर पर कैसे बदल रहे हैं नियम?

दुनिया के कई देश टेक कंपनियों की इस मनमानी पर लगाम लगाने के लिए पहले ही कड़े कदम उठा चुके हैं:

देशउठाए गए कदम / कानूनी मॉडल
ऑस्ट्रेलियाएक ऐसा ऐतिहासिक मॉडल पेश किया, जहां टेक कंपनियों को न्यूज पब्लिशर्स के कंटेंट के बदले उन्हें भुगतान करना अनिवार्य है।
यूरोपीय यूनियन व स्पेनस्पेन ने 2014 से ही न्यूज के अंश दिखाने पर भुगतान की मांग की थी। बाद में EU के नए कॉपीराइट नियमों के बाद अब लाइसेंसिंग समझौतों का रास्ता साफ हुआ है।
चीनजनरेटिव एआई के लिए अंतरिम नियम लागू किए गए हैं, जिसके तहत AI द्वारा बनाए गए टेक्स्ट, फोटो, ऑडियो और वीडियो को 'AI जनरेटेड' लेबल करना जरूरी है।

 

निष्कर्ष: विशेषज्ञों का साफ तौर पर मानना है कि अगर एआई सर्च फीचर्स इसी तरह न्यूज वेबसाइट्स की रीडरशिप (पाठक संख्या) और विज्ञापन की कमाई को निगलते रहे, तो भविष्य में निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए एक बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा। भारत को भी जल्द ही अपने डिजिटल कानूनों में बदलाव कर पब्लिशर्स के हितों की रक्षा करनी होगी।

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