वाशिंगटन डीसी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन से एक और हाई-प्रोफाइल विदाई की बड़ी खबर सामने आई है। देश की 'डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस' (DNI) तुलसी गबार्ड को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है। हालांकि, आधिकारिक तौर पर उनके हटने का कारण पारिवारिक बताया गया है, लेकिन वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि नीतियों पर गहरे मतभेदों के चलते गबार्ड के लिए व्हाइट हाउस में 'डू नॉट इनवाइट' (आमंत्रित न करें) जैसी स्थिति बन चुकी थी।
पारिवारिक वजह या व्हाइट हाउस का दबाव?
गबार्ड के इस्तीफे के पीछे दो अलग-अलग कहानियां सामने आ रही हैं:
आधिकारिक पक्ष: गबार्ड के हटने के पीछे उनके पति अब्राहम विलियम्स को 'बोन कैंसर' (हड्डी का कैंसर) होने की पारिवारिक वजह बताई गई है।
अंदरूनी रिपोर्ट: वाशिंगटन के विश्लेषकों के मुताबिक, गबार्ड पर पद छोड़ने के लिए काफी समय से दबाव बनाया जा रहा था, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े उनके बयान ट्रंप प्रशासन की आधिकारिक लाइन से मेल नहीं खा रहे थे।
ट्रंप की नीतियों से अलग था 'एंटी-वार' रुख
तुलसी गबार्ड शुरुआत से ही युद्ध-विरोधी (Anti-war) और विदेशी मामलों में अमेरिकी दखलंदाजी के खिलाफ रही हैं। हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने भी चुनाव के दौरान 'कोई नया युद्ध न करने' के वादे किए थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनका प्रशासन ईरान, वेनेजुएला और रूस-यूक्रेन जैसे वैश्विक मोर्चों पर सीधे या परोक्ष रूप से आक्रामक रुख अपनाता दिखा।
गबार्ड और ट्रंप प्रशासन के बीच की यह खाई पिछले साल जून में तब और चौड़ी हो गई जब गबार्ड ने एक वीडियो जारी कर अमेरिकी नीतियों की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था:
"राजनीतिक अभिजात वर्ग जानबूझकर परमाणु शक्तियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है।"
इसके कुछ ही समय बाद अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला कर दिया था, जिसने गबार्ड की स्थिति को प्रशासन के भीतर और कमजोर कर दिया।
खुफिया एजेंसियों के भीतर अलगाव और टकराव
गबार्ड की पृष्ठभूमि पेशेवर खुफिया अधिकारी की नहीं थी, जिसके चलते उन्हें अमेरिकी खुफिया तंत्र (Intelligence Community) के भीतर संस्थागत समर्थन नहीं मिल पाया। इसके अलावा, सीआईए (CIA) के निदेशक जॉन रैटक्लिफ के साथ उनके रिश्ते काफी तनावपूर्ण रहे। गबार्ड का मानना था कि रैटक्लिफ उन्हें दरकिनार कर सीधे राष्ट्रपति से संपर्क कर रहे थे।
इस स्थिति पर पूर्व सीआईए अधिकारी मार्क पॉलिमेरोपोलोस ने टिप्पणी करते हुए कहा:
"वाशिंगटन में खुफिया प्रमुख होने का पहला नियम यह है कि आपके पास राष्ट्रपति का भरोसा होना चाहिए। अगर आपके पास राष्ट्रपति का कान और उनका भरोसा नहीं है, तो आप इस पद पर प्रभावी नहीं रह सकते।"
'अमेरिका फर्स्ट' बनाम 'इजरायल फर्स्ट' पर आंतरिक कलह
प्रशासन के भीतर इस बात को लेकर भी आंतरिक शीतयुद्ध चल रहा था कि ट्रंप की मौजूदा विदेश नीति 'अमेरिका फर्स्ट' के बजाय 'इजरायल फर्स्ट' की ओर झुक गई है। दक्षिणपंथी धड़े के टकर कार्लसन और स्टीव बैनन जैसे नेता भी ईरान के साथ बढ़ते तनाव से असहमत थे और गबार्ड इसी युद्ध-विरोधी गुट का प्रतिनिधित्व कर रही थीं।
तल्खी इस कदर बढ़ चुकी थी कि जब ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा टीम मार-ए-लागो में वेनेजुएला सैन्य अभियान की समीक्षा कर रही थी, तब गबार्ड उस महत्वपूर्ण बैठक से नदारद होकर हवाई (Hawaii) में थीं।
ट्रंप कैबिनेट में 'चौथा बड़ा विकेट'
वाशिंगटन के विश्लेषक गबार्ड के इस इस्तीफे को ट्रंप प्रशासन के एक खास पैटर्न से जोड़कर देख रहे हैं। तुलसी गबार्ड कैबिनेट छोड़ने वाली चौथी बड़ी महिला अधिकारी बन गई हैं। इनसे पहले इन तीन बड़ी महिला नेताओं को भी बाहर का रास्ता देखना पड़ा था:
| अधिकारी का नाम | पूर्व पद | निष्कासन/हटने का कारण |
|---|---|---|
| क्रिस्टी नोएम | होमलैंड सिक्योरिटी प्रमुख | विवाद और विफलताएं |
| पाम बोंडी | अटॉर्नी जनरल | नीतिगत मतभेद |
| लोरी चावेज़-डेरेमर | श्रम सचिव | आज्ञाकारिता की कमी |
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के दरबार में महिलाओं को प्रतीकात्मक रूप से बड़ी जिम्मेदारियां तो मिलती हैं, लेकिन विवाद होने या लाइन से अलग हटने पर उन्हें पुरुषों के मुकाबले बहुत कम मौका दिया जाता है।
ईरान ने कसा तंज: "इजरायल की प्रॉक्सी बन चुका है प्रशासन"
तुलसी गबार्ड की विदाई पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी गरमा गई है। आर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से एक पोस्ट कर इस पर तीखा तंज कसा गया है।
ईरान ने गबार्ड के पति के जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हुए लिखा:
"यह बेहद दुखद है कि तुलसी गबार्ड सरकार में रहकर भी ईरान के बारे में सच बोल रही थीं, जिसे ट्रंप प्रशासन पसंद नहीं करता था। आखिरकार उन्हें उस सरकार ने किनारे कर दिया जो खुद इजरायल की प्रॉक्सी बन चुकी है।"
तुलसी गबार्ड का जाना ट्रंप प्रशासन की आंतरिक कलह और अस्थिर विदेश नीति पर कई गंभीर सवाल खड़े कर गया है, जिसका असर आने वाले दिनों में अमेरिकी राजनीति पर दिखना तय है।