नई दिल्ली / दुबई। भूमिहीन किसान के घर जन्मे सुनील पूनिया ने सोचा था कि मर्चेंट नेवी की नौकरी उनके परिवार को गरीबी के दलदल से बाहर निकाल देगी। लेकिन उनकी पहली ही समुद्री यात्रा एक डरावने दुःस्वप्न में बदल गई। मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में जारी ईरान युद्ध की तपिश अब अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में निर्दोष मर्चेंट नाविकों का खून बहा रही है, और इस खौफनाक मंजर में सबसे ज्यादा हताहत होने वाले नाविक हमारे अपने भारत के हैं।
वह खौफनाक रात: जब आग का गोला बन गया जहाज
1 मार्च को ओमान के खसाब बंदरगाह के पास पलाऊ ध्वज वाले तेल टैंकर 'एमवी स्काईलाइट' पर एक मिसाइल आकर गिरी। चश्मदीद सुनील पूनिया उस मंजर को याद कर आज भी सिहर उठते हैं:
"एक जोरदार धमाका हुआ और पूरा जहाज हिल गया। देखते ही देखते सब कुछ आग की लपटों में घिर गया। हमने लाइफ जैकेट पहनी और सीधे उफनते समंदर में छलांग लगा दी। मैंने अपने साथी दलीप को बहुत आवाजें दीं, लेकिन वह आग की चपेट में आ चुका था।"
इस हमले में राजस्थान के दलीप सिंह और बिहार के कप्तान आशीष कुमार सिंह ने अपनी जान गंवा दी। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के मुताबिक, इस संघर्ष में अब तक 11 मर्चेंट नाविकों की मौत हो चुकी है, जिनमें से कम से कम चार भारतीय थे।
युद्ध के मुहाने पर समंदर: क्यों सुलग रहा है यह रास्ता?
28 फरवरी को संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों के बाद से ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाले जहाजों के आवागमन पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं।
महत्व: यह दुनिया का वह सबसे संवेदनशील समुद्री रास्ता है जहां से वैश्विक तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की सप्लाई का लगभग 1/5 (20%) हिस्सा गुजरता है।
ताजा हालात: अमेरिका ने जवाब में ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी कर दी है। ब्रिटिश समुद्री सुरक्षा मॉनिटर (UKMTO) के अनुसार, इस इलाके में जहाजों पर मिसाइल दागने और गोलीबारी की दर्जनों घटनाएं हो चुकी हैं।
फंसे हुए नाविक: इस नाकेबंदी के कारण वर्तमान में करीब 20,000 नाविक समुद्र में फंसे हुए हैं, जिनमें हजारों भारतीय शामिल हैं।
आंकड़ों के झरोखे से: वैश्विक नौवहन में भारत का दबदबा
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| ग्लोबल शेयर | भारत दुनिया भर में मर्चेंट शिपिंग में नाविक देने वाले सबसे बड़े देशों में से एक है। |
| सक्रिय नाविक | साल 2025 तक दुनिया भर के समुद्रों में 3,20,000 से अधिक भारतीय नाविक सेवाएं दे रहे थे। |
| ताजा हादसा | 13 मई को सोमालिया से पशुधन ले जा रहे एक भारतीय जहाज पर हमला हुआ, हालांकि चालक दल के सभी 14 सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया गया। |
बेरोजगारी का दलदल बनाम मौत का कुआं
आखिर तमाम खतरों के बावजूद भारतीय युवा इस मौत के कुएं में क्यों कूद रहे हैं? इसका सीधा जवाब है— भारत में बेरोजगारी और आर्थिक तंगी।
फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया के महासचिव मनोज यादव कहते हैं, "युवा सिर्फ रोजी-रोटी कमाना चाहते हैं। कम शैक्षणिक योग्यता के बावजूद इस फील्ड में मिलने वाली अच्छी सैलरी युवाओं को आकर्षित करती है।"
टूटे सपने, उजड़े परिवार:
राजस्थान के 25 वर्षीय दलीप सिंह सरकारी नौकरी न मिलने पर कर्ज लेकर मर्चेंट नेवी में गए थे। उन्हें 450 डॉलर (करीब 37,000 रुपये) प्रति माह मिलते थे, जो उनके गांव की औसत आय से तीन गुना ज्यादा थे। दलीप की मौत की खबर सुनकर उनके पिता को ऐसा सदमा लगा कि दिल का दौरा पड़ने से उनका भी निधन हो गया। उधर, बिहार के कप्तान आशीष कुमार सिंह की पत्नी अंशु कुमारी रोते हुए सरकार से गुहार लगा रही हैं कि बस उनके पति का पार्थिव शरीर भारत वापस ला दिया जाए।
खौफ के साए में भी डटे रहने की जिद
इस जानलेवा माहौल के बाद भी नाविकों के पास पीछे हटने का रास्ता नहीं है। यूएई के फुजैराह बंदरगाह पर मिसाइलों की बौछार के बीच फंसे राजस्थान के नाविक राजू राम फोन पर कहते हैं, "बेशक यह खतरनाक है, लेकिन जो पैसा हम घर भेजते हैं, उसकी वजह से हमारे परिवारों को समाज में सम्मान मिलता है।"
हादसे में बाल-बाल बचे सुनील पूनिया भी इसी कड़वी सच्चाई को दोहराते हैं, "भारत में हमारे जैसे लोगों को जो नौकरियां मिलती हैं, उनमें आप हमेशा कर्ज के जाल में फंसे रहते हैं। इस काम में कम से कम पैसा तो अच्छा है।" साफ़ है कि इन जांबाज नाविकों के लिए पेट की भूख का डर, युद्ध की मिसाइलों के डर से कहीं ज्यादा बड़ा है।