सिनेमा का वो 'अनाम' इतिहास: जानिए भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार 'बिब्बो' के बारे में, जिनके नाम पर बना था गाना!

अभिनय में माहिर, गायकी में बेमिसाल; 30 के दशक में 'अदल-ए-जहांगीर' से संगीत की दुनिया में इतिहास रचने वाली इशरत सुल्ताना की अनकही कहानी।

25 May 2026  |  65

 

 

एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में महिलाओं ने अभिनय और गायकी के दम पर एक से बढ़कर एक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। लता मंगेशकर, आशा भोंसले से लेकर आज के दौर की गायिकाओं की आवाज का जादू तो हर किसी ने सिर चढ़कर बोला, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय सिनेमा को उसकी पहली महिला संगीतकार (First Female Music Director) कब और कौन मिली थी?

जब हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो 1930 के दशक में एक ऐसा नाम उभरकर सामने आता है, जो न सिर्फ अभिनय में माहिर थीं, बल्कि धुनें बनाने में भी उनका कोई सानी नहीं था। वह दिग्गज कलाकार थीं— बिब्बो (Bibbo) उर्फ इशरत सुल्ताना

भारत की पहली बोलती फिल्म से की थी शुरुआत

साल 1906 में देश की राजधानी दिल्ली में जन्मीं बिब्बो हुनर का जीती-जागती मिसाल थीं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अभिनय से की थी। भारतीय सिनेमा की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' (1931) में उन्होंने मुख्य अभिनेत्री जुबैदा की सहेली का किरदार निभाया था। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया।

1934 में रचा इतिहास: बनीं पहली महिला संगीतकार

अभिनय और गायकी में पहचान बनाने के बाद बिब्बो ने साल 1934 में अपने हुनर के दायरे को और बढ़ाया। उन्होंने फिल्म 'अदल-ए-जहांगीर' के लिए संगीत तैयार किया और इसके साथ ही वे भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार बन गईं। 30 और 40 के दशक में सिनेमाई पर्दे से लेकर गानों की धुनों तक, हर तरफ बिब्बो का ही राज था।

एक अनोखा रिकॉर्ड: गाने में शामिल था उनका नाम! बिब्बो भारतीय सिनेमा की पहली ऐसी अभिनेत्री थीं, जिनके सम्मान में बाकायदा एक गाना तैयार किया गया था और उसमें उनके नाम का जिक्र था। साल 1939 में आई फिल्म 'गरीब के लाल' में एक बेहद लोकप्रिय गाना था— 'तुझे बिब्बो कहूं कि सुलोचना'। यह गीत उस दौर में हर जुबान पर चढ़ गया था।

बंटवारे के बाद पाकिस्तान में भी बिखेरा जलवा

साल 1947 में भारत के विभाजन के बाद बिब्बो पाकिस्तान चली गईं। वतन बदलने के बाद भी सिनेमा के प्रति उनका प्यार कम नहीं हुआ। साल 1950 में उन्होंने फिल्म 'शम्मी' से पाकिस्तानी सिनेमा में अपना कमबैक किया। उन्होंने लगभग 22 वर्षों तक पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय रूप से काम किया और अपनी अदाकारी का जादू बिखेरा।

निधन:

सिनेमा की इस महान और बहुमुखी विधा की धनी कलाकार ने साल 1972 में कराची (पाकिस्तान) में अपनी अंतिम सांसें लीं। भले ही आज इतिहास के पन्नों में उनका नाम कहीं धुंधला गया हो, लेकिन संगीत की दुनिया में क्रांति लाने वाली इस पहली महिला को हमेशा याद रखा जाएगा।

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