पश्चिम एशिया संकट से भारत पर बढ़ा आर्थिक बोझ; FY27 में रिकॉर्ड ₹3 लाख करोड़ पार जा सकता है फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल

महज 40 दिनों में यूरिया की वैश्विक कीमतों में 65% का भारी उछाल; खाद्य सुरक्षा और बजट संतुलन को बनाए रखने के लिए सरकार बनाएगी नई रणनीति!

26 May 2026  |  41

 

 

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष का सीधा असर अब भारत के बजट और कृषि क्षेत्र पर पड़ता दिखाई दे रहा है। एक तरफ जहां सरकार देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसानों को महंगे उर्वरकों से बचाने का प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे माल की बढ़ती कीमतों ने सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, यदि मौजूदा तनाव लंबा खिंचता है, तो वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में भारत का कुल फर्टिलाइजर (उर्वरक) सब्सिडी बिल ₹3 लाख करोड़ से लेकर ₹3.5 लाख करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच सकता है।

यह राशि सरकार द्वारा बजट में अनुमानित ₹1.71 लाख करोड़ के लक्ष्य से लगभग दोगुनी है, जो राजकोषीय प्रबंधन के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रही है।

यूरिया और एलएनजी (LNG) की कीमतों में लगी आग

इस अभूतपूर्व संकट की मुख्य वजह वैश्विक कमोडिटी बाजार में फर्टिलाइजर और ऊर्जा (फीडस्टॉक) की कीमतों में आया अचानक उछाल है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास बढ़ते व्यवधानों के कारण आयात और परिवहन लागत आसमान छू रही है:

यूरिया की कीमतों में 65% की तेजी: भारतीय किसानों के लिए सबसे जरूरी खाद 'यूरिया' की वैश्विक कीमत फरवरी 2026 के अंत में जहाँ $482 (लगभग ₹40,000) प्रति टन थी, वह अप्रैल की शुरुआत तक महज 40 दिनों के भीतर $795 प्रति टन तक पहुंच गई। वहीं, इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) के हालिया आयात टेंडर्स में यह कीमतें $959 प्रति टन तक के स्तर को छू चुकी हैं।

एलएनजी (LNG) भी हुई महंगी: घरेलू स्तर पर यूरिया उत्पादन के लिए प्राथमिक कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होने वाली लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की कीमतें कुछ ही हफ्तों में $10.4/MMBtu से बढ़कर $17.4/MMBtu हो गईं और मार्च 2026 की शुरुआत में इसने $25/MMBtu का आंकड़ा पार कर लिया।

बजटीय अनुमानों में बड़ा फेरबदल

भू-राजनीतिक संकट से पहले सरकार को उम्मीद थी कि वित्त वर्ष 2026-27 में फर्टिलाइजर सब्सिडी ₹2 लाख करोड़ के अंदर ही सिमट जाएगी। केंद्रीय बजट में यूरिया (घरेलू और आयातित) के लिए ₹1.16 लाख करोड़ और फॉस्फोरस व पोटाश आधारित खादों के लिए ₹54,000 करोड़ का प्रावधान किया गया था। लेकिन अब बदले हुए हालातों में यदि यह संकट आगामी खरीफ और रबी सीजन तक जारी रहता है, तो सरकारी खजाने पर ₹1.5 लाख करोड़ से ज्यादा का अतिरिक्त भार पड़ना तय है।

सरकार की प्रतिक्रिया: विकल्पों की तत्काल तलाश

वैश्विक स्तर पर खादों की कीमतों में आए इस उछाल को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान "अकल्पनीय" बताया। उन्होंने देश का ध्यान ईंधन (Fuel), फर्टिलाइजर (Fertilizer) और विदेशी मुद्रा भंडार (Forex) के कुशल प्रबंधन की ओर केंद्रित करने की अपील की है।

नीति आयोग और थिंक टैंक की चेतावनी:

आर्थिक अनुसंधान संस्थान 'ICRIER' के एक नीति पत्र में नीति आयोग के सदस्य के. वी. राजू ने सरकार को आगामी खरीफ बुआई सीजन के लिए तुरंत ठोस कदम उठाने की सलाह दी है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भारत पश्चिम एशिया पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए रूस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या अफ्रीकी देशों जैसे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से संपर्क कर इस कमी को पूरा कर सकता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?

सब्सिडी बिल में इतनी बड़ी बढ़ोतरी का असर देश के समग्र आर्थिक विकास पर पड़ सकता है। जब सरकार का एक बड़ा फंड सब्सिडी में जाएगा, तो बुनियादी ढांचे (Infrastructure), शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश के लिए बजट कम पड़ सकता है।

साथ ही, यह संकट भारतीय कृषि की रासायनिक खादों पर अत्यधिक निर्भरता पर भी सवाल खड़े करता है। आने वाले महीने भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे, जहां सरकार को एक तरफ अपने किसानों को वैश्विक मूल्य झटकों से बचाना होगा और दूसरी तरफ देश के वित्तीय घाटे (Fiscal Deficit) को भी नियंत्रण में रखना होगा। इसके लिए लंबी अवधि में आयात के विविधीकरण (Diversification) और घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की रणनीतियों पर बहस तेज हो गई है।

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