एवरेस्ट के 'डेथ जोन' में ही रहेगा हैदराबाद के पर्वतारोही अरुण तिवारी का पार्थिव शरीर, परिवार बोला— "यह महादेव की गोद में समाधि है"

8848 मीटर पर सपना पूरा कर दुनिया को कहा अलविदा; धार्मिक आस्था और शव लाने के अत्यधिक जोखिम के कारण परिजनों ने लिया भावुक फैसला।

27 May 2026  |  107

 

 

हैदराबाद / काठमांडू। माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर इतिहास रचने वाले हैदराबाद के 53 वर्षीय टेक प्रोफेशनल और पर्वतारोही अरुण कुमार तिवारी का पार्थिव शरीर अब हमेशा के लिए हिमालय की बर्फीली वादियों का हिस्सा बनकर रहेगा। पिछले हफ्ते एवरेस्ट फतह कर नीचे उतरते समय 'डेथ जोन' में दम तोड़ने वाले अरुण तिवारी के परिवार ने बेहद भावुक लेकिन बड़ा फैसला लेते हुए उनके शव को वापस न लाने का निर्णय किया है।

परिवार के अनुसार, यह फैसला सिर्फ भारी-भरकम खर्च की वजह से नहीं, बल्कि उनकी गहरी धार्मिक आस्था और हिमालय के प्रति अरुण के अगाध प्रेम को देखते हुए लिया गया है।

शिखर छूने की जिद: शेरपा की सलाह भी ठुकराई

भारतीय अभियान दल का हिस्सा रहे अरुण तिवारी ने साल 2025 में भी एवरेस्ट फतह करने की कोशिश की थी, लेकिन तब खराब स्वास्थ्य के कारण उन्हें 7200 मीटर की ऊंचाई से वापस लौटना पड़ा था। इस सीजन में वे अपने अधूरे सपने को पूरा करने के संकल्प के साथ दोबारा गए थे।

अभियान का संचालन करने वाली कंपनी पायनियर एडवेंचर के मालिक निवेश कार्की ने बताया:

"कैंप-4 से अंतिम चढ़ाई के दौरान अरुण बेहद थक चुके थे। उनके निजी शेरपा गाइड ने उन्हें वहीं से वापस लौटने की सलाह दी थी, लेकिन अरुण ने यह कहकर मना कर दिया कि 'जब शिखर इतना करीब और साफ दिख रहा है, तो मैं अपना सपना अधूरा नहीं छोड़ सकता।' उन्होंने एवरेस्ट फतह तो कर लिया, लेकिन नीचे उतरते समय हिलेरी स्टेप के पास उन्हें खून की उल्टियां होने लगीं। शेरपाओं ने अतिरिक्त ऑक्सीजन देकर उन्हें बचाने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन उन्होंने वहीं दम तोड़ दिया।"

इसी अभियान में शामिल भारत के एक अन्य 46 वर्षीय पर्वतारोही संदीप अरे की भी नीचे उतरते समय मौत हो गई थी, हालांकि कम ऊंचाई पर होने के कारण उनका शव नीचे लाया जा चुका है।

"धरती पर वापस लाना पाप..." : परिवार ने दी आध्यात्मिक दलील

अरुण तिवारी अपने पीछे पत्नी और दो बेटियों को छोड़ गए हैं। उनके साले सुधीर उपाध्याय ने इस फैसले के पीछे छिपे गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक कारणों को साझा किया। उन्होंने कहा:

वैकुंठधाम की प्राप्ति: "हमारे पवित्र धार्मिक ग्रंथों में हिमालय को माता पार्वती का पिता (हिमवान) माना गया है। ऐसी पावन भूमि पर मृत्यु होने का अर्थ है कि व्यक्ति सीधे वैकुंठधाम गया है। उन्हें वहां से वापस खींचकर धरती पर लाना एक तरह से पाप माना जाता है।"

शव नहीं, यह 'समाधि' है: परिवार अब अरुण तिवारी की मृत्यु को एक आम मौत के रूप में नहीं, बल्कि 'समाधि' की तरह देख रहा है। वे अब अनंत काल के लिए हिमालय का और अप्रत्यक्ष रूप से भगवान शिव का हिस्सा बन चुके हैं।

एवरेस्ट फतह से भी खतरनाक है 'डेथ जोन' से शव लाना

धार्मिक आस्था के अलावा व्यावहारिक चुनौतियां भी इस फैसले की बड़ी वजह बनीं। जिस 'हिलेरी स्टेप' (8000 मीटर से अधिक ऊंचाई) के पास अरुण का शव है, उसे एवरेस्ट का 'डेथ जोन' कहा जाता है, जहां ऑक्सीजन का स्तर न के बराबर होता है।

एजेंसी ने पहले शव को नीचे लाने का खर्च 1.14 लाख डॉलर (करीब 1.1 करोड़ रुपये) बताया था, जिसे बाद में घटाकर 94 हजार डॉलर (करीब 89.7 लाख रुपये) किया गया। लेकिन अधिकारियों का स्पष्ट कहना था कि इतनी ऊंचाई से शव को नीचे उतारना, खुद एवरेस्ट फतह करने से भी कहीं ज्यादा खतरनाक और जानलेवा काम है। ऐसे में परिवार ने किसी और शेरपा की जान जोखिम में न डालने का मानवीय फैसला किया।

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