मुंबई/नई दिल्ली: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का सबसे आलीशान और एलीट माना जाने वाला 'ब्रीच कैंडी क्लब' (Breach Candy Club) एक बार फिर अपनी विवादित और कथित नस्लभेदी सदस्यता नीति (Membership Policy) को लेकर देशव्यापी बहस के केंद्र में आ गया है। विवाद की वजह क्लब का वह नियम है, जिसके तहत इसके ट्रस्ट की सदस्यता केवल और केवल यूरोपीय पासपोर्ट धारकों को ही दी जा सकती है। इस औपनिवेशिक मानसिकता वाले नियम को लेकर अब देश भर में तीखा आक्रोश देखा जा रहा है।
इस विवाद के बीच, तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर अपना एक बेहद चौंकाने वाला और पुराना अनुभव साझा किया है, जो अब तेजी से वायरल हो रहा है।
"आजादी के 20 साल बाद मुझे भी बाहर निकाला गया था" — शशि थरूर
शशि थरूर ने अपने एक पुराने ब्लॉग का हवाला देते हुए बताया कि 1960 के दशक में उन्हें खुद इस क्लब से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था।
शशि थरूर ने लिखा: "उस समय मेरा एक अमेरिकी दोस्त मुझे क्लब के अंदर ले जाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन क्लब के कड़े और भेदभावपूर्ण नियमों के कारण मुझे अंदर जाने से रोक दिया गया। यह आजादी के 20 साल बाद का भारत था, जहाँ एक भारतीय को ही एंट्री नहीं थी।"
घटना के दोबारा चर्चा में आने पर थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "भारत की सरकारी जमीन पर किसी भी तरह के नस्लभेदी प्रावधान के बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। हमारे देश के संविधान का क्या? ऐसे भेदभाव को अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।"
गुलाम भारत का इतिहास: सिर्फ 'गोरों' के लिए बना था क्लब
ब्रीच कैंडी क्लब का इतिहास औपनिवेशिक काल से जुड़ा है:
स्थापना: इस क्लब की स्थापना साल 1878 में ब्रिटिश शासन के दौरान की गई थी, और यह सिर्फ यूरोपीय लोगों के लिए आरक्षित था।
1960 का दशक: इस दौर तक किसी भी भारतीय को क्लब की सदस्यता देना पूरी तरह प्रतिबंधित था।
आज की स्थिति: हालांकि बाद में आम एंट्री के नियमों में कुछ ढील दी गई, लेकिन क्लब की सबसे शक्तिशाली 'ट्रस्ट कमेटी' की सदस्यता आज भी सिर्फ मुंबई में रहने वाले यूरोपीय नागरिकों तक ही सीमित है।
सोशल मीडिया पर फूटा जनता का गुस्सा: "दुकान बढ़ाओ और यूरोप जाओ"
थरूर की पोस्ट के बाद इंटरनेट पर यूजर्स का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। लोग इसे भारतीय संप्रभुता और संविधान का अपमान बता रहे हैं।
एक यूजर ने लिखा, "अगर कोई क्लब शशि थरूर जैसी अंतरराष्ट्रीय शख्सियत को एंट्री देने से मना कर सकता है, तो आम भारतीयों के स्वाभिमान का क्या? इसे तुरंत बैन किया जाना चाहिए।"
दूसरे यूजर ने तीखा तंज कसते हुए कहा, "भारत की धरती पर भारतीयों से ही भेदभाव? ऐसे क्लब को ताला लगा देना चाहिए, ये अपना धंधा जाकर यूरोप में चलाएं।"
दिल्ली जिमखाना क्लब का भी उठा मुद्दा; सरकार सख्त
यह विवाद ऐसे समय पर गहराया है जब हाल ही में दिल्ली के एक और एलीट 'जिमखाना क्लब' को लेकर भी सोशल मीडिया पर भारी बहस छिड़ी थी। वहाँ भी आम भारतीयों की एंट्री को लेकर कड़े नियम हैं और सदस्यता में यूरोपीय देशों के नागरिकों को प्राथमिकता देने की बात सामने आई थी।
प्रशासनिक कार्रवाई: इस मामले में सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए क्लब को परिसर खाली करने का नोटिस जारी किया है। सरकार का स्पष्ट तर्क है कि देश के मुख्य हिस्से में स्थित इतनी बड़ी सरकारी प्रॉपर्टी का इस्तेमाल महज कुछ खास और गिने-चुने लोगों के विशेषाधिकार के लिए नहीं किया जा सकता। अब देखना यह है कि मुंबई के ब्रीच कैंडी क्लब के इस नस्लभेदी नियम पर प्रशासन क्या कार्रवाई करता है।