खरीफ सीजन से पहले क्रॉपलाइफ इंडिया की अपील: 'पैराक्वाट और कार्बोफुरान पर प्रतिबंध से नहीं रुकेगी किसानों की आत्महत्या'

कर्ज और फसल की बर्बादी है सुसाइड की मुख्य वजह, दवाएं रोकना समाधान नहीं; बैन से बढ़ सकती है छोटे किसानों की आर्थिक तंगी।

27 May 2026  |  63

 

 

नई दिल्ली। तेलंगाना में हालिया प्रतिबंध और कीटनाशकों से होने वाली मौतों पर बढ़ती चिंताओं के बीच, केंद्र सरकार फसल सुरक्षा उत्पादों 'पैराक्वाट डाइक्लोराइड' (Paraquat Dichloride) और 'कार्बोसल्फान' (Carbosulfan) की बिक्री की समीक्षा कर रही है। इस बीच, देश की शीर्ष फसल सुरक्षा संस्था क्रॉपलाइफ इंडिया (CropLife India) ने सरकार से आग्रह किया है कि कोई भी अंतिम फैसला लेने से पहले जमीनी हकीकत और किसान आत्महत्याओं के वास्तविक कारणों को समझा जाए। संस्था का कहना है कि सिर्फ साधनों पर रोक लगाने से मूल समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि खरीफ सीजन की शुरुआत में इस फैसले से किसानों की वित्तीय स्थिति और खराब हो सकती है।

"आत्महत्या का कारण मानसिक नहीं, आर्थिक संकट"

क्रॉपलाइफ इंडिया ने वैज्ञानिक अध्ययनों और शोध का हवाला देते हुए कहा है कि किसान आत्महत्या के पीछे कर्ज का जाल, फसल की बर्बादी और वैकल्पिक आजीविका का न होना मुख्य कारण हैं:

तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का अध्ययन (2024): 'इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन' में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, किसानों की आत्महत्या के मुख्य कारण आर्थिक हैं, जिसमें कर्ज का जाल सबसे केंद्रीय बिंदु है।

मौसम का प्रभाव: 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट' के एक अध्ययन के अनुसार, जब बारिश में 25% की कमी होती है, तो पांच उच्च-बोझ वाले राज्यों में किसान आत्महत्याओं का आंकड़ा बढ़कर 1,188 तक पहुंच जाता है। जहां सामाजिक सुरक्षा और गारंटीकृत रोजगार (जैसे मनरेगा) उपलब्ध थे, वहां फसल खराब होने के बाद भी आत्महत्या के मामले कम रहे।

खरीफ सीजन के मुहाने पर प्रतिबंध बढ़ाएगा संकट

क्रॉपलाइफ इंडिया के चेयरमैन और क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड के कार्यकारी अध्यक्ष अंकुर अग्रवाल ने कहा:

"किसी उत्पाद पर बहस करते समय हम किसान आत्महत्या की मुख्य चिंता से भटक रहे हैं। किसी प्रॉडक्ट को रातों-रात हटा देने से किसान का संकट खत्म नहीं होता; कर्ज, खराब फसल और भविष्य का डर वैसे ही बना रहता है। अगर लक्ष्य जान बचाना है, तो हमें ऋण की उपलब्धता, फसल की सही कीमत और फसल बीमा जैसे बुनियादी समाधानों पर ध्यान देना होगा।"

संस्था ने चेतावनी दी है कि खरीफ बुवाई सीजन शुरू होने के ठीक पहले इस तरह के प्रतिबंध से किसानों की इनपुट कॉस्ट (लागत) बढ़ जाएगी, क्योंकि उन्होंने पहले ही अपने बजट की योजना बना ली है।

आंकड़ों की नजर में दोनों उत्पादों की अहमियत

'डायरेक्टरेट ऑफ वीड रिसर्च' (ICAR संस्थान) और 'फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया' के एक साझा सर्वे के मुताबिक, देश में खरपतवारों (Weeds) के कारण हर साल लगभग ₹92,000 करोड़ की फसल बर्बाद हो जाती है। खरीफ फसलों में 25-26% और रबी में 18-25% पैदावार का नुकसान सिर्फ खरपतवारों से होता है।

पैराक्वाट (Paraquat): देश में सालाना करीब 80 लाख एकड़ में इसका इस्तेमाल चाय, कपास, आलू, मक्का और बागवानी फसलों में खरपतवार नियंत्रण के लिए होता है। यह मैनुअल निराई-गुड़ाई (मजदूरों द्वारा) के मुकाबले बेहद किफायती (₹300-350 प्रति एकड़) है, खासकर तब जब देश में कृषि मजदूरों की भारी कमी है।

कार्बोसल्फान (Carbosulfan): धान की फसल में 'गॉल मिज' (Gall Midge) कीट के खिलाफ यह सबसे प्रभावी विकल्पों में से एक है और देश के करीब 32 लाख एकड़ में इसका उपयोग किया जाता है।

प्रतिबंध के बजाय 'सुरक्षित उपयोग' का सुझाव

क्रॉपलाइफ इंडिया (जो देश के करीब 70% क्रॉप प्रोटेक्शन मार्केट का प्रतिनिधित्व करती है) ने सरकार द्वारा इस मुद्दे पर बनाई गई विशेषज्ञ समिति (Expert Committee) का स्वागत किया है। संस्था ने प्रतिबद्धता जताई है कि वह सरकार के साथ मिलकर पूरे देश में एक व्यापक जागरूकता और ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाने को तैयार है।

इसके तहत सुरक्षित भंडारण, पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (PPE) का उपयोग, लेबल साक्षरता, नियंत्रित और निगरानी के साथ बिक्री, तथा सुरक्षित फॉर्मूलेशन जैसे उपाय शामिल हैं, जिससे जोखिम को न्यूनतम किया जा सके और किसानों के हितों की रक्षा भी हो।

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