'जज कोई पवित्र गाय नहीं... न्यायपालिका में भी है भ्रष्टाचार': तमिल फिल्म पर बैन की याचिका खारिज कर मद्रास हाई कोर्ट की बेबाक टिप्पणी

"सिनेमा में नाटकीयता आम बात, कलाकार को है अभिव्यक्ति की आजादी"; कोर्ट ने माना—वकीलों के बिना नहीं पनप सकता न्यायिक भ्रष्टाचार।

28 May 2026  |  91

 

 

चेन्नई। मद्रास हाई कोर्ट ने एक तमिल फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की याचिका को खारिज करते हुए न्यायपालिका की स्थिति को लेकर बेहद सख्त, ईमानदार और बेबाक टिप्पणी की है। कोर्ट ने खुले तौर पर स्वीकार किया है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार मौजूद है और जजों को 'पवित्र गाय' (Sacred Cow) की तरह अछूता नहीं समझा जाना चाहिए, जिनकी आलोचना न की जा सके।

"पहले भी भ्रष्ट जज थे और आज भी हैं"

जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा:

"कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है। पहले भी भ्रष्ट जज थे और आज भी हैं... हम इस कड़वी सच्चाई को जानते हैं और हमारे सामने न्यायिक भ्रष्टाचार के मामले आए हैं। ऐसे भ्रष्ट जजों को हाई कोर्ट की फुल कोर्ट नियमित रूप से बाहर का रास्ता दिखाती है।"

भ्रष्टाचार की जड़ में 'बार' के कुछ सदस्य: हाई कोर्ट

अदालत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि न्यायिक भ्रष्टाचार अकेले नहीं पनप सकता। बेंच ने कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार तब तक संभव नहीं है, जब तक बार (वकीलों के समूह) के कुछ सदस्य भ्रष्ट तत्वों के साथ हाथ न मिला लें। अक्सर बार के सदस्य ही इस भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। हालांकि, हाई कोर्ट ऐसे भ्रष्ट लोगों को पकड़ने और स्थिति से सख्ती से निपटने के लिए हमेशा कड़ी नजर रखता है।

आम जनता की जांच-परख के लिए खुला है न्याय

जजों को 'पवित्र गाय' मानने से इनकार करते हुए अदालत ने साफ किया कि न्याय कोई छिपाकर रखने वाली चीज नहीं है। इसे आम लोगों की जांच-परख और उनके द्वारा की जाने वाली सम्मानजनक, भले ही बेबाक टिप्पणियों का सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा विवाद एक तमिल फिल्म के दृश्य को लेकर शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी, क्योंकि फिल्म के एक सीन में एक जज को रिश्वत लेते और नशीले पदार्थों का सेवन करते हुए दिखाया गया था।

याचिकाकर्ता का तर्क: यह सीन संविधान की भावना के खिलाफ है और जजों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाता है। फिल्म के निर्देशक बालाजी ने बिना सोचे-समझे भारतीय न्यायिक व्यवस्था की गलत छवि पेश की है।

कोर्ट का फैसला: हाई कोर्ट ने माना कि फिल्म में व्यवस्था को थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है, लेकिन तमिल सिनेमा में हर चीज को नाटकीय अंदाज़ में पेश करना एक आम बात है।

अभिव्यक्ति और कलात्मक स्वतंत्रता सर्वोपरि

कोर्ट ने इसे निर्देशक की कलात्मक स्वतंत्रता बताते हुए कहा कि फिल्म कला की एक रचना है। एक कलाकार के पास खुद को उस तरीके से व्यक्त करने की पूरी आज़ादी होती है, जिसकी कानून में मनाही न हो। कलाकार को किसी भी सामाजिक स्थिति को अपने नजरिए से पेश करने का पूरा अधिकार है। इसी के साथ कोर्ट ने फिल्म पर प्रतिबंध लगाने से साफ इनकार कर दिया।

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