दोहरी सुरक्षा चुनौती से निपटने को तैयार भारत: 'न युद्ध, न शांति' की स्थिति के लिए सैन्य रणनीति मजबूत, IISS रिपोर्ट में खुलासा

चीन-पाकिस्तान के छद्म मंसूबों को नाकाम करने के लिए भारतीय सेना का आधुनिकीकरण तेज; आतंकवाद के खिलाफ जवाबी कार्रवाई का दायरा हुआ और व्यापक।

28 May 2026  |  53

 

 

नई दिल्ली / सिंगापुर। चीन और पाकिस्तान की ओर से मिलने वाली दोहरी सुरक्षा चुनौती (Twin-Front Challenge) के मद्देनजर भारत अपनी सैन्य रणनीति और परंपरागत युद्ध क्षमता को लगातार धार दे रहा है। दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसी देशों के साथ जारी सीमा विवाद और तनाव के बीच, भारत किसी भी बड़े स्तर के सैन्य अभियान के लिए अपनी तैयारियों को तेजी से मजबूत कर रहा है।

लंदन स्थित प्रतिष्ठित वैश्विक थिंक-टैंक 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज' (IISS) की 'एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सुरक्षा आकलन रिपोर्ट' में यह बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की सुरक्षा चिंताओं के केंद्र में अब भी पाकिस्तान और चीन ही हैं, और भारत अब "न युद्ध, न शांति" (Gray Zone Warfare) जैसी हाइब्रिड स्थिति से निपटने के लिए एक बेहद आक्रामक और आधुनिक रणनीति पर काम कर रहा है।

बदल गया भारत का सैन्य सिद्धांत: सर्जिकल स्ट्राइक से 2025 के अभियानों तक

IISS की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान समर्थित सीमा पार आतंकवाद और लगातार बने रहने वाले तनाव ने भारत की पारंपरिक सैन्य सोच को पूरी तरह बदल दिया है।

वर्ष 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक और हालिया 2025 के अभियानों जैसे कड़े कदमों ने साफ संकेत दिया है कि भारत अब आतंकवाद के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के दायरे को पहले से कहीं अधिक व्यापक और मारक बना चुका है।

इन सैन्य अभियानों से मिले जमीनी अनुभवों और रणनीतियों को अब आधिकारिक तौर पर भारतीय सैन्य सिद्धांत (Military Doctrine) में शामिल किया जा रहा है। इससे भारतीय सेना की ऑपरेशनल क्षमता और रणनीतिक जवाबी कार्रवाई की तैयारी पहले से कई गुना मजबूत हुई है।

हिंद महासागर में बढ़ती चीनी चुनौती

रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि चीन के साथ भारत का सीधा टकराव भले ही वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और सैन्य तैनाती तक सीमित रहा हो, लेकिन हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) और एशिया-प्रशांत में बीजिंग की बढ़ती नौसैनिक सक्रियता भारत के लिए एक नई और गंभीर रणनीतिक चुनौती है। यही कारण है कि भारत अपनी समुद्री और हवाई सैन्य मौजूदगी का लगातार विस्तार कर रहा है।

चुनौती का मोर्चारणनीतिक प्रभाव और भारत की तैयारी
उत्तरी व पूर्वी सीमा (चीन)एलएसी पर भारी सैन्य तैनाती और बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण।
पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान)आतंकवाद के खिलाफ व्यापक 'प्रो-एक्टिव' जवाबी कार्रवाई की रणनीति।
हिंद महासागर क्षेत्र (IOR)चीनी नौसेना को संतुलित करने के लिए समुद्री सुरक्षा और निगरानी का विस्तार।

 

ताइवान संकट और अमेरिका-चीन टकराव से दूरी

IISS की रिपोर्ट में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का भी जिक्र किया गया है। रिपोर्ट का आकलन है कि हिंद महासागर क्षेत्र से बाहर भारत की सैन्य भूमिका फिलहाल सीमित रह सकती है। भारत खुद को ताइवान जलडमरूमध्य को लेकर होने वाले किसी भी अमेरिका-चीन टकराव से दूर रखने की कोशिश करेगा, क्योंकि उसका प्राथमिक ध्यान अपनी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

राजनीतिक नेतृत्व का बढ़ा भरोसा

रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि भारत के सैन्य सिद्धांत अब तेजी से बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल के अनुरूप खुद को ढाल रहे हैं। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि देश का राजनीतिक नेतृत्व अब सेना की तैयारियों, साजो-सामान और संभावित संघर्षों से निपटने की उसकी क्षमता को लेकर पहले से कहीं अधिक आश्वस्त और दृढ़ है।

शांगरी-ला संवाद पर नजर:

सैन्य समीकरणों और सुरक्षा चुनौतियों पर आधारित इस रिपोर्ट के आने के बाद, 29 से 31 मई तक सिंगापुर में होने वाले 'शांगरी-ला संवाद' (Shangri-La Dialogue) पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं, जहां एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और इस नए सुरक्षा ढांचे पर गहन चर्चा होने की उम्मीद है।

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