शिक्षा की गूंज पर भारी सामाजिक कुप्रथा: देश में बाल विवाह की जड़ें अब भी मजबूत, पश्चिम बंगाल और झारखंड सबसे आगे

SRS 2024 की रिपोर्ट ने खोली दावों की पोल; राष्ट्रीय स्तर पर शादियों की औसत उम्र तो बढ़ी, लेकिन पूर्वी भारत में हर चौथी लड़की आज भी 21 साल से पहले विवाह के बंधन में बांध दी जाती है। दिल्ली-केरल ने पेश की मिसाल।

29 May 2026  |  92

 

 

नई दिल्ली: बेटियों की शिक्षा, सशक्तिकरण और देर से शादी को बढ़ावा देने के लिए चलाए जा रहे तमाम बड़े सरकारी दावों और देशव्यापी अभियानों के बावजूद भारत में 'बाल विवाह' का कलंक पूरी तरह मिट नहीं पाया है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा जारी 'सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम' (SRS) सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024 के ताजा आंकड़े चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, देश के कई हिस्सों में आज भी 18 साल की कानूनी उम्र से पहले ही लड़कियों की शादी कर दी जा रही है। इस कुप्रथा को जारी रखने में पश्चिम बंगाल और झारखंड पूरे देश में सबसे आगे (शीर्ष पर) बने हुए हैं, जहाँ ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरी इलाकों में भी आंकड़े बेहद डरावने हैं।

राष्ट्रीय तस्वीर: औसत उम्र तो सुधरी, लेकिन चुनौतियां बरकरार

राहत की बात यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर बदलाव दिख रहा है। देश में महिलाओं की शादी की औसत उम्र बढ़कर अब 23.1 साल हो गई है।

हालाँकि, सिक्कों का दूसरा पहलू यह है कि आज भी भारत में हर चार में से एक से अधिक महिला की शादी 21 साल की उम्र पूरी होने से पहले ही हो जाती है।

2024 में देश में शादियों का आयु-वार अनुपात:

18 साल से कम (बाल विवाह): 2.1% महिलाएं

18 से 20 साल की उम्र के बीच: 24.5% महिलाएं

21 साल या उससे अधिक उम्र में: 73.5% महिलाएं

बाल विवाह के गढ़: कहाँ सबसे ज्यादा हो रहा कानून का उल्लंघन?

रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वी और मध्य भारत के कुछ राज्यों में यह सामाजिक बुराई गहराई से धंसी हुई है।

राज्य18 साल से कम उम्र में शादी का कुल अनुपातग्रामीण क्षेत्रों में स्थितिशहरी क्षेत्रों में स्थिति
पश्चिम बंगाल6.3% (देश में सर्वाधिक)5.9%7.6% (राष्ट्रीय शहरी औसत 1.1% से काफी ज्यादा)
झारखंड4.9% (दूसरे स्थान पर)5.8%ग्रामीण इलाकों में स्थिति गंभीर
छत्तीसगढ़2.9%-मध्य भारत का प्रभावित राज्य

 

शहरी बनाम ग्रामीण अंतर: राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण भारत में 18 साल से कम उम्र में शादी करने वाली लड़कियों का अनुपात 2.4% है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 1.1% है। लेकिन पश्चिम बंगाल के शहरी आंकड़े (7.6%) इस मामले में एक हैरान करने वाला अपवाद हैं।

उम्मीद की किरण: दिल्ली और केरल ने दिखाई राह

जहाँ कुछ राज्य इस समस्या से जूझ रहे हैं, वहीं देश के कुछ हिस्सों ने इस मोर्चे पर बेहतरीन कामयाबी हासिल की है:

दिल्ली: SRS 2024 के सर्वेक्षण के दौरान देश की राजधानी दिल्ली में बाल विवाह का एक भी मामला (0%) सामने नहीं आया।

केरल: साक्षरता में अव्वल रहने वाले इस राज्य में बाल विवाह की दर देश में सबसे कम मात्र 0.04% दर्ज की गई।

हरियाणा और हिमाचल प्रदेश: इन दोनों राज्यों में भी कम उम्र में शादी के आंकड़े बेहद निचले स्तर पर रहे।

विशेषज्ञों की चिंता: पढ़ाई छूटने से लेकर स्वास्थ्य तक का खतरा

स्वास्थ्य और सामाजिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इस कुप्रथा का सीधा असर देश के मानव विकास सूचकांक (HDI) पर पड़ता है।

गंभीर परिणाम: कम उम्र में शादी होने के कारण लड़कियों की उच्च शिक्षा बीच में ही छूट जाती है। इसके परिणामस्वरूप वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पातीं। सबसे गंभीर बात यह है कि कम उम्र में मां बनने के कारण उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है, जिससे शिशु और मातृ मृत्यु दर (MMR) का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक सामाजिक सोच में बदलाव और जमीनी स्तर पर सख्त कानून का पालन नहीं होगा, तब तक इस कुप्रथा को जड़ से मिटाना मुश्किल है।

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