करेंसी पर बड़ा अपडेट: भारत में जल्द चलेंगे प्लास्टिक के नोट! बढ़ती नकदी और छपाई के भारी खर्च से निपटने के लिए RBI की बड़ी तैयारी

कागजी नोटों की विदाई और आधुनिक 'पॉलिमर' युग की दस्तक; जल्द शुरू हो सकता है पायलट प्रोजेक्ट। UPI के दौर में भी रिकॉर्ड ₹42.86 लाख करोड़ पर पहुंची कैश की डिमांड।

29 May 2026  |  86

 

 

नई दिल्ली: देश में लगातार बढ़ती नकदी (कैश) की मांग और फटे-पुराने नोटों को नष्ट करने में होने वाले भारी-भरकम खर्च से निपटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक क्रांतिकारी कदम उठाने जा रहा है। केंद्रीय बैंक अब भारत में प्लास्टिक (पॉलिमर) के नोट छापने पर बेहद गंभीरता से विचार कर रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पटना और मुंबई में हुई आरबीआई की हालिया बोर्ड बैठकों में इस रणनीतिक बदलाव पर विस्तार से चर्चा हुई है। संभावना जताई जा रही है कि आम जनता के बीच इन नोटों की स्वीकार्यता और तकनीकी व्यवहार्यता को परखने के लिए जल्द ही एक पॉलट प्रोजेक्ट (प्रायोगिक परियोजना) शुरू किया जा सकता है।

क्यों पड़ रही है प्लास्टिक नोटों की जरूरत?

इस बड़े फैसले के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं—टिकाऊपन (Durability) और कम उत्पादन लागत (Low Production Cost)

बदलता भारत, अपग्रेड होते ATM: वर्तमान कागजी नोटों की उम्र कम होती है, वे जल्दी गंदे और खराब हो जाते हैं। इसके विपरीत पॉलिमर नोट लंबे समय तक चलते हैं। चूंकि भारत अब तकनीकी रूप से बेहद उन्नत हो चुका है, इसलिए देश के एटीएम (ATMs) को इन प्लास्टिक नोटों को आसानी से स्वीकार करने और निकालने के लिए आसानी से अपग्रेड किया जा सकेगा।

करेंसी का गणित: कागजी नोटों को नष्ट करने और छपाई का बढ़ता बोझ

आरबीआई की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि कागजी करेंसी को मेंटेन रखना अर्थव्यवस्था पर कितना भारी पड़ रहा है:

1. नोट नष्ट करने का बढ़ता आंकड़ा

वित्त वर्ष 2024-25 (FY25): लगभग ₹23.8 अरब मूल्य के फटे-पुराने नोट नष्ट किए गए।

बढ़ोतरी: यह पिछले वर्ष (₹21.24 अरब) की तुलना में 12.3% अधिक है।

सबसे ज्यादा प्रभावित: नष्ट किए गए नोटों में सर्वाधिक संख्या ₹500 और ₹100 के नोटों की थी।

2. छपाई की भारी-भरकम लागत

वित्त वर्ष 2024-25 में छपाई खर्च: ₹6,372.8 करोड़ रुपए।

पिछले वर्ष का खर्च: ₹5,101.4 करोड़ रुपए।

असर: प्लास्टिक नोट आने से बार-बार नोट छापने के इस सालाना खर्च में भारी कटौती होगी।

डिजिटल क्रांति के बाद भी 'कैश इज किंग': रिकॉर्ड स्तर पर नकदी की मांग

हैरानी की बात यह है कि देश में यूपीआई (UPI) और डिजिटल लेनदेन में अभूतपूर्व तेजी आने के बावजूद बाजार में नकदी (Currency in Circulation - CIC) की मांग कम होने का नाम नहीं ले रही है।

कुल नकदी का रिकॉर्ड: 15 मई तक बाजार में कुल नकदी 11.5% बढ़कर ₹42.86 लाख करोड़ के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंच गई।

छोटे नोटों का हाल: बाजार में ₹10 और ₹20 के छोटे नोटों की मांग बहुत अधिक है, लेकिन कुल नकदी में इनकी हिस्सेदारी क्रमशः मात्र 0.7% और 0.8% है। सरकार ने इसके विकल्प के रूप में सिक्कों को बढ़ावा देने की कोशिश की थी, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।

2012 का ट्रायल रहा था फेल, इस बार क्या है अलग?

भारत में प्लास्टिक नोटों का यह पहला प्रयास नहीं है। इससे पहले साल 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने देश के पांच शहरों में परीक्षण के तौर पर ₹10 के 1 अरब प्लास्टिक नोट जारी करने का फैसला किया था। लेकिन उस समय बैंकों और एटीएम मशीनों में आई तकनीकी दिक्कतों के कारण इस प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा था।

अब क्या बदला? पिछले एक दशक में वित्तीय तकनीक (Fintech) में बड़ा बदलाव आया है। अब हमारे पास ऐसे आधुनिक और उन्नत तकनीकी टूल्स मौजूद हैं जो एटीएम मशीनों में इन प्लास्टिक नोटों की पहचान और उनकी गिनती को बेहद आसान और त्रुटिहीन बना देंगे।

दुनिया के किन देशों में चलती है प्लास्टिक करेंसी?

देश / स्थितिविवरण
ऑस्ट्रेलिया (1988)दुनिया का पहला देश जिसने प्लास्टिक का ($10) नोट जारी किया।
अन्य प्रमुख देशसिंगापुर, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया, रोमानिया और कनाडा समेत करीब 60 देशों में पॉलिमर नोट चलन में हैं।
अमेरिकी डॉलर (अपवाद)दुनिया की सबसे मजबूत करेंसी अमेरिकी डॉलर आज भी प्लास्टिक की नहीं, बल्कि कपास (कॉटन) और लिनन के एक विशेष मिश्रण से बनती है।

 

प्लास्टिक नोटों की यह संभावित शुरुआत भारतीय बैंकिंग और अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ सकती है, जिससे न सिर्फ जाली नोटों पर लगाम लगेगी बल्कि पर्यावरण और सरकारी खजाने को भी बड़ी राहत मिलेगी।

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