नई दिल्ली।
भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे दोहरे संकट के मुहाने पर खड़ी है, जहां जोखिम ऊपर आसमान (मौसम) और नीचे समंदर (जियो-पॉलिटिक्स) दोनों तरफ से आ रहा है। एक तरफ जहां देश एक दशक के सबसे कमजोर मानसून का सामना करने की कगार पर है, वहीं दूसरी ओर भारत से 2,000 किलोमीटर दूर 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने देश के एग्री-बिजनेस की कमर तोड़ दी है। इस दोहरे झटके के कारण देश का चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ने, फर्टिलाइजर सब्सिडी का बजट फटने और आम आदमी की रसोई का बजट बिगड़ने की गंभीर आशंका पैदा हो गई है।
पहली मार: 90% बारिश का अनुमान, 10 साल में सबसे कमजोर मानसून का खतरा
भारतीय किसान इस महीने से चावल, मक्का और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों की बुवाई शुरू करने जा रहे हैं, लेकिन मौसम विभाग (IMD) के ताजा अनुमानों ने चिंता बढ़ा दी है:
अल-नीनो का बोलबाला: प्रशांत महासागर में अल-नीनो का पैटर्न तेजी से सक्रिय हो रहा है। जून से सितंबर के दौरान इसके हावी रहने की 92% संभावना है।
कमजोर बारिश: इस साल कुल मानसून दीर्घकालिक औसत (LPA) का महज 90 फीसदी रहने का अनुमान है, जो कि सूखे जैसी स्थिति का संकेत है।
दूसरी मार: होर्मुज स्ट्रेट में नाकेबंदी से 95% थमा शिपिंग ट्रैफिक
भारत दुनिया में खाद का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और अपनी जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। पश्चिम एशिया संकट के चलते होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग ट्रैफिक 95% तक गिर गया है। इससे हर महीने 30 से 40 लाख टन फर्टिलाइजर का व्यापार रुक गया है।
दोगुने हुए दाम: संकट के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया और डीएपी (DAP) की कीमतें बढ़कर 950 डॉलर प्रति मीट्रिक टन के पार पहुंच गई हैं। संघर्ष से पहले के मुकाबले यूरिया के दाम में 123% और डीएपी में 39% का उछाल आया है।
पीएम मोदी की अपील: रासायनिक खाद का इस्तेमाल आधा करें
बढ़ते आर्थिक दबाव को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से सिर्फ पेट्रोल-डीजल बचाने की ही अपील नहीं की है, बल्कि किसानों से रासायनिक खादों का इस्तेमाल तुरंत आधा करने का आग्रह किया है। पीएम ने मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए प्राकृतिक और जैविक खेती (Natural Farming) को अपनाने पर जोर दिया है, ताकि देश के आयात बिल (Import Bill) और व्यापार घाटे को नियंत्रित किया जा सके।
बजट का गणित बिगड़ा: ₹3 लाख करोड़ पार जाएगा सब्सिडी का बोझ
PwC इंडिया के लीडर (ऑयल एंड गैस) मानस मजूमदार और क्रिसिल इंटेलिजेंस के निदेशक पुशान शर्मा के अनुसार, भारत इस समय एक 'दुष्चक्र' में फंस गया है:
सब्सिडी में बंपर उछाल: बजट में फर्टिलाइजर सब्सिडी के लिए ₹1.7 लाख करोड़ तय किए गए थे, लेकिन कच्चे माल की आसमान छूती कीमतों के कारण यह बिल ₹3 लाख करोड़ के पार (75% ज्यादा) निकल सकता है।
वित्तीय घाटा (Fiscal Deficit): इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ के चलते देश का कुल राजकोषीय घाटा 50 बेसिस प्वाइंट बढ़कर जीडीपी का 4.7 से 4.8 फीसदी तक पहुंच सकता है।
रुपये पर दबाव: कच्चा तेल और खाद महंगी होने से डॉलर के मुकाबले रुपया, जो फिलहाल ₹95 के स्तर पर है, टूटकर ₹100 के मनोवैज्ञानिक स्तर की ओर जा सकता है।
राहत की बात: खरीफ के लिए बफर स्टॉक सुरक्षित, रबी की चिंता
इकरा (ICRA) लिमिटेड की चीफ इकोनॉमिस्ट अदिति नायर के मुताबिक, भारतीय किसानों के लिए फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आगामी खरीफ बुवाई चक्र के लिए देश के पास पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है। सरकार ने अपने घरेलू स्टॉक की सप्लाई भी 12% बढ़ाकर 200 लाख मीट्रिक टन कर दी है। हालांकि, अगर पश्चिम एशिया का यह संकट लंबा खिंचता है, तो आगामी रबी सीजन के लिए खाद की उपलब्धता पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
किचन के बजट पर मंडराया महंगाई का खतरा
भले ही सरकार खुद भारी नुकसान सहकर किसानों को पुरानी कीमतों पर खाद दे रही है, लेकिन मानसून की बेरुखी और माल ढुलाई की बढ़ी लागत का अंतिम असर आम आदमी की थाली पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि साल 2023 की तरह मानसून कमजोर रहा, तो खाद्य सूचकांक (Food Inflation) एक बार फिर 11.5 प्रतिशत के खतरनाक स्तर को छू सकता है, जिससे फल, सब्जियां, अनाज और दालें आम उपभोक्ता की पहुंच से दूर हो सकती हैं।