खेती-किसानी डेस्क।
धान की खेती करने वाले अन्नदाताओं के लिए चालू सीजन बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन बुवाई और रोपाई की तैयारियों के बीच एक ऐसी खतरनाक बीमारी के प्रति सतर्क होना जरूरी है, जो आपकी महीनों की मेहनत और लागत पर पानी फेर सकती है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह बीमारी धान की पैदावार को सीधे आधा यानी 50% तक कम कर सकती है। इस घातक समस्या का नाम है—खैरा रोग (Khaira Disease)।
शुरुआत में किसान भाई इसे एक सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन देखते ही देखते यह बीमारी पूरे खेत को अपनी चपेट में ले लेती है। सही समय पर पहचान और उपचार न होने से पूरी फसल के बर्बाद होने की नौबत आ जाती है।
कैसे पहचानें 'खैरा रोग'? ये हैं मुख्य लक्षण
धान के पौधों को अंदर से कमजोर और खोखला बनाने वाले इस रोग के लक्षण काफी स्पष्ट होते हैं:
पत्तियों का रंग बदलना: शुरुआत में धान की पत्तियां हल्की पीली पड़ने लगती हैं। कुछ समय बाद इन पर कत्थई (Brown) या जंग जैसे लाल-भूरे रंग के छोटे-छोटे धब्बे साफ दिखाई देने लगते हैं।
बौना पौधा: बीमारी के असर से पौधा एकदम बौना रह जाता है और उसका विकास पूरी तरह रुक जाता है।
जड़ों का न फैलना: प्रभावित पौधों की जड़ें ठीक से नहीं फैल पातीं और उनमें कल्ले फूटने की रफ्तार भी थम जाती है।
बीमारी की असली वजह: मिट्टी में 'जिंक' की कमी
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, धान में खैरा रोग लगने की सबसे बड़ी और मुख्य वजह मिट्टी में जिंक (जस्ते) की भारी कमी होना है। जब खेत की मिट्टी में जिंक का स्तर आवश्यक मात्रा से कम हो जाता है, तो पौधे जरूरी पोषक तत्व ग्रहण नहीं कर पाते। नर्सरी तैयार करते समय या मुख्य खेत में रोपाई के तुरंत बाद यह समस्या सबसे ज्यादा उभरकर सामने आती है।
बचाव और रोकथाम के अचूक उपाय
इस घातक बीमारी से अपनी फसल को सुरक्षित रखने का सबसे सही और सटीक समय रोपाई से ठीक पहले का होता है। किसान भाई नीचे दी गई वैज्ञानिक कड़ियों को अपनाकर अपनी फसल बचा सकते हैं:
1. मिट्टी की जांच और शुरुआती डोज (परमानेंट इलाज)
किसानों को सलाह दी जाती है कि वे बुवाई से पहले अपने खेत की मिट्टी की जांच जरूर करवाएं। अगर मिट्टी में जिंक की कमी पाई जाती है, तो खेत की आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ के हिसाब से सही मात्रा में जिंक सल्फेट मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। ऐसा करने से पौधों को शुरुआती स्टेज से ही पूरा पोषण मिलता है और बीमारी का खतरा जड़ से टल जाता है।
2. खड़ी फसल के लिए 'आपातकालीन स्प्रे'
यदि रोपाई के बाद खड़ी फसल में खैरा रोग के लक्षण दिखाई देने लगें, तो किसानों को तुरंत कदम उठाना चाहिए। इसके लिए:
जिंक सल्फेट और बुझे हुए चूने (या यूरिया) का एक संतुलित घोल तैयार करें।
इस घोल का खड़ी फसल पर समान रूप से तुरंत छिड़काव (स्प्रे) करें। यह छिड़काव पौधों को त्वरित राहत देता है और बीमारी को आगे फैलने से रोकता है।
कृषि विशेषज्ञों का संदेश:
"बुवाई और रोपाई से पहले की गई थोड़ी सी सावधानी, मिट्टी का सही परीक्षण और जिंक सल्फेट का सही समय पर इस्तेमाल किसानों को बड़े आर्थिक नुकसान से बचा सकता है। सही पोषण प्रबंधन ही धान की बंपर पैदावार और किसानों की खुशहाली की असली चाबी है।"