काठमांडू: स्थानीय राजनीति में अपने आक्रामक फैसलों के लिए कभी युवाओं के 'पोस्टर बॉय' रहे नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह इस समय अपने ही घर में बुरी तरह घिर चुके हैं। भारत के साथ नेपाल के सदियों पुराने 'रोटी-बेटी' के पारंपरिक और संवेदनशील रिश्तों को विवादों के चौराहे पर लाकर खड़ा करने वाले पीएम शाह के खिलाफ अब नेपाल के भीतर ही बगावत के सुर तेज हो गए हैं।
संसद में लगातार अनुपस्थिति और भारत-नेपाल सीमा विवाद को लेकर दिए गए उनके एक अपरिपक्व बयान ने नेपाल की राजनीति में ऐसा भूचाल ला दिया है कि विपक्ष तो दूर, उनके अपने विदेश मंत्री, गठबंधन सहयोगियों और खुद उनकी पार्टी 'राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी' (RSP) ने भी प्रधानमंत्री के रुख से साफ किनारा कर लिया है।
5 मिनट की दूरी... और संसद से 'लापता' प्रधानमंत्री
जब नेपाल की संसद सिंह दरबार के नए आलीशान भवन में शिफ्ट हुई थी, तो जनता को उम्मीद थी कि सरकार और संसद मिलकर तेजी से काम करेंगे। प्रधानमंत्री कार्यालय से संसद भवन महज 5 मिनट की पैदल दूरी पर है, लेकिन यह दूरी बालेन शाह के लिए सबसे लंबी यात्रा बन चुकी है। सत्र शुरू होते ही सत्ता और विपक्ष के सांसद पीएम को ढूंढते रह जाते हैं, लेकिन वे गायब रहते हैं।
जनता के पैसे की बर्बादी: देश का खर्च बचाने के लिए विदेश यात्राएं न करने का दम भरने वाले बालेन शाह की अनुपस्थिति के कारण संसद बार-बार स्थगित हो रही है। कई महत्वपूर्ण बिल और विकास योजनाएं लटकी पड़ी हैं, जिससे संसद चलाने पर रोजाना खर्च होने वाला करीब 11 लाख रुपये का पब्लिक टैक्स पानी में बह रहा है।
विवाद की वजह: वो बयान जिसने सबको चौंकाया
31 मई को लंबे समय बाद संसद पहुंचे प्रधानमंत्री बालेन शाह ने एक ऐसा ऐतिहासिक रूप से गलत और चौंकाने वाला बयान दिया, जिसने नेपाल की विदेश नीति की बुनियाद को हिलाकर रख दिया। उन्होंने कहा:
"हम कहते हैं कि दूसरे हमारी जमीन पर कब्जा करते हैं, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों को देखें तो नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्जा किया है।"
सीमा विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों ने इस बयान को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि बिना किसी ऐतिहासिक रिकॉर्ड के खुद को आक्रामक दिखाने के लिए दिया गया यह बयान नेपाल की संप्रभुता के लिए आत्मघाती है।
सुगौली संधि में ब्रिटेन-चीन को घसीटने की नाकाम कोशिश
प्रधानमंत्री शाह यहीं नहीं रुके। उन्होंने साल 1816 की ऐतिहासिक 'सुगौली संधि' का जिक्र करते हुए कहा कि भारत-नेपाल के बीच जारी सीमा विवाद (कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा) को सुलझाने के लिए ब्रिटेन को शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने इस मामले में चीन को भी मध्यस्थ बनाने की बात कह डाली।
चौतरफा घिरे पीएम: विदेश मंत्री ने ही खोल दी पोल
भारत हमेशा से नेपाल के साथ अपने रिश्तों को पूरी तरह 'द्विपक्षीय' (Bilateral) मानता आया है और इसमें किसी तीसरे देश का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करता। बालेन शाह के इस अंतरराष्ट्रीय राग पर नेपाल के भीतर ही उनका भारी विरोध शुरू हो गया:
विदेश मंत्री शिशिर खनाल का यू-टर्न: नेपाली विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने तुरंत पीएम के बयान से दूरी बनाते हुए सफाई दी कि नेपाल, ब्रिटेन से कोई मध्यस्थता नहीं चाहता, बल्कि वह सिर्फ पुराने नक्शे और दस्तावेज चाहता है।
विपक्ष का तीखा हमला: नेपाली कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने कहा कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय हित को कमजोर किया है और भारत जैसे मददगार दोस्त से दूरी बनाने की कूटनीतिक गलती की है।
बालेन शाह का 'भारत विरोधी' पुराना ट्रैक रिकॉर्ड
यह पहला मौका नहीं है जब बालेन शाह ने भारत विरोधी एजेंडा चलाने की कोशिश की हो। इससे पहले भी वे कई बार सुर्खियों में रहे हैं:
| विवादित कदम | विवरण और असर |
|---|---|
| कस्टम टैक्स विवाद | 'नेपाल फर्स्ट' के नाम पर भारत से आने वाले मात्र ₹100 के सामान पर भी कस्टम ड्यूटी लगा दी, जिसका सीमावर्ती नागरिकों ने भारी विरोध किया। |
| 'ग्रेटर नेपाल' का नक्शा | काठमांडू के मेयर रहते हुए अपने दफ्तर में 'ग्रेटर नेपाल' का नक्शा लगाया, जिसमें भारत के उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, सिक्किम और पश्चिम बंगाल के हिस्सों को नेपाल का दिखाया गया था। |
| भारतीय फिल्मों पर बैन | काठमांडू में सभी भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध लगाया। जब अदालत ने इस बैन को हटाया, तो उन्होंने न्यायपालिका और सरकार को 'भारत का गुलाम' तक कह दिया था। |
विशेषज्ञों की राय: 'अपरिपक्व और नुकसानदेह कूटनीति'
नेपाल के पूर्व राजनयिकों का मानना है कि एक देश के प्रधानमंत्री का हर शब्द आधिकारिक होता है। इस तरह के बयानों से नेपाल की वैश्विक साख गिरती है। सोशल मीडिया पर भी बालेन शाह को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है, जहाँ बहुसंख्यक लोग इसे उनकी 'बड़ी कूटनीतिक भूल' मान रहे हैं। कई मंत्रालयों का कार्यभार खुद अपने पास रखने के कारण पहले ही सुस्त पड़ी बालेन शाह सरकार के लिए यह नया विवाद उनके राजनीतिक अस्तित्व का सबसे बड़ा संकट बन सकता है।